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##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #☝ मेरे विचार #भगवद गीता
#भगवद गीता🙏🕉️ - कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं   पुरुषोउश्रुते। 7 नच सन्न्यसनादेव सिद्धि समधिगच्छति I। मनुष्य न तो  कर्मोंका आरम्भ   किये  बिना निष्कर्मताको * यानी योगनिष्ठाको प्राप्त होता है केवल और न कर्मोंके त्यागमात्रसे सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठाको ही प्राप्त होता है Il ४Il न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः II निःसन्देह कोई भी मनुष्य किसी भी कालमें क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता; क्योंकि सारा मनुष्यसमुदाय प्रकृतिजनित गुणोंद्वारा परवश हुआ कर्म करनेके लिये बाध्य किया जाता है II ५ II कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्। इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते I। जो मूढ़बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियोंको हठपूर्वक ऊपरसे रोककर मनसे उन इन्द्रियोंके विषयोंका वह मिथ्याचारी अर्थात् चिन्तन करता रहता है दम्भी कहा जाता है II६Il कर्म अकर्म हो जाते जिस अवस्थाको प्राप्त हुए पुरुषके उत्पन्न नहीं कर सकते हैँ अर्थातू फल उस अवस्थाका नाम  निष्कर्मता  ೯| श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 3 गीता प्रेस , गोरखपुर से साभार कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं   पुरुषोउश्रुते। 7 नच सन्न्यसनादेव सिद्धि समधिगच्छति I। मनुष्य न तो  कर्मोंका आरम्भ   किये  बिना निष्कर्मताको * यानी योगनिष्ठाको प्राप्त होता है केवल और न कर्मोंके त्यागमात्रसे सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठाको ही प्राप्त होता है Il ४Il न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः II निःसन्देह कोई भी मनुष्य किसी भी कालमें क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता; क्योंकि सारा मनुष्यसमुदाय प्रकृतिजनित गुणोंद्वारा परवश हुआ कर्म करनेके लिये बाध्य किया जाता है II ५ II कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्। इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते I। जो मूढ़बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियोंको हठपूर्वक ऊपरसे रोककर मनसे उन इन्द्रियोंके विषयोंका वह मिथ्याचारी अर्थात् चिन्तन करता रहता है दम्भी कहा जाता है II६Il कर्म अकर्म हो जाते जिस अवस्थाको प्राप्त हुए पुरुषके उत्पन्न नहीं कर सकते हैँ अर्थातू फल उस अवस्थाका नाम  निष्कर्मता  ೯| श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 3 गीता प्रेस , गोरखपुर से साभार - ShareChat