#पौराणिक कथा
सम्राट #परीक्षित
दादाजी के ज्ञान की गहनता से सभी बच्चे बड़े आश्चर्य चकित हो रहे थे । इतना विशद ज्ञान कैसे हुआ उन्हें ? सभी के मन में यह जिज्ञासा थी लेकिन कोई कहने का साहस नहीं कर सका । तब रिद्धिमा ने पूछा
"दादाजी , आपने ये तो बताया था कि राजा परीक्षित को शुकदेव मुनि ने सबसे पहले श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा सुनाई थी । पर पहले यह तो बताइए कि राजा परीक्षित और शुकदेव मुनि कौन थे" ?
बच्चों की उत्सुकता देखकर दादाजी बड़े प्रसन्न हुए । जब श्रोता वक्ता से वक्तव्य के विषय में प्रश्न करने लगे तो यह समझना चाहिए कि श्रोताओं को उनका वक्तव्य बहुत पसंद आ रहा है । जो बात वक्ता कहना चाह रहा है वह श्रोताओं को समझ में आ रही है, वे उसमें रुचि ले रहे हैं और अपने प्रश्नों के उत्तर भी चाहते हैं । इससे वक्ता को अपना वक्तव्य सारगर्भित लगने लगता है । दादाजी अभिभूत होते हुए कहने लगे
"इसका मतलब है कि इस विषय पर बात करना आप सबको अच्छा लग रहा है । बहुत अच्छा । चलिए, मैं पहले आपको राजा परीक्षित के बारे में बताता हूं ।
महाभारत के युद्ध में जब दुर्योधन की जांघ भीम ने अपनी गंदा से तोड़ दी थी और दुर्योधन अपंग होकर वहीं पर गिर पड़ा था । तब एक तरह से युद्ध का निर्णय हो गया था । सारे कौरव मारे जा चुके थे । दुर्योधन भी लगभग मृत हो चुका था । ऐसे में पांडवों की विजय निश्चित हो गई थी ।
तब तक कौरव सेना में केवल द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा, कौरवों के पुरोहित और गुरू कृपाचार्य तथा कृष्ण भगवान की नारायणी सेना के सेनापति कृतवर्मा ये केवल तीन महारथी ही जिन्दा बचे थे बाकी सब लोग मारे जा चुके थे । जबकि पांडव सेना में अनेक महारथी जिन्दा थे ।
ये तीनों महारथी रात्रि में दुर्योधन से मिले तब दुर्योधन ने अश्वत्थामा को अपना सेनापति बनाया और युद्ध जारी रखने को कहा । अश्वत्थामा ने रात्रि में सोती हुई पांडव सेना को मारने का निश्चय कर लिया और अपनी योजना कृपाचार्य और कृतवर्मा को समझा दी ।
कहते हैं कि दुष्ट आदमी का साथ हो तो सद्गुणी व्यक्ति भी पापकर्म में सम्मिलित हो जाता है । कृपाचार्य जैसे मनीषी और कृतवर्मा जैसे भगवान श्रीकृष्ण के योद्धा भी अश्वत्थामा की दुष्टता और उसके पापकर्म में शामिल हो गये, यह आश्चर्यजनक है । इसलिए हमें कभी भी दुष्ट लोगों का संग नहीं करना चाहिए । जो कृतवर्मा भगवान श्रीकृष्ण की सेना का सेनापति था वह अश्वत्थामा की नीच योजना में शामिल हो गया । इससे सिद्ध होता है कि दुष्ट लोगों के साथ से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है ।
अश्वत्थामा ने योजना बनाई थी कि पांडव सेना जब सो जायेगी तब उनके शिविर में आग लगा दी जायेगी जिससे वे लोग सोते सोते ही आग में जलकर मर जायेंगे । जो कोई सैनिक या योद्धा भागने की कोशिश करेगा उसे ये तीनों महारथी नंगी तलवार से मार देंगे ।
इस योजना के अनुसार अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर में चुपके से आग लगा दी । शिविर के द्वारों पर कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामा अपने अपने हाथों में नंगी तलवार लेकर खड़े हो गए और जो कोई वहां से बचकर भागना चाहता था, उसे नंगी तलवार से काट कर इन्होंने मार डाला । उस रात पांचों पांडवों और सात्यकि को भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पास बुला लिया था इसलिए वे बच गए, बाकी सब योद्धा मारे गये ।
सुबह होने पर जब इस घटना के बारे में ज्ञात हुआ तो अर्जुन बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने अश्वत्थामा को पकड़ लिया । तब अश्वत्थामा ने अपने बचाव के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया । ब्रह्मास्त्र एक ऐसा अस्त्र था जो अचूक था और उससे समूची सृष्टि का विनाश होना तय था । अर्जुन ने भी अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र की काट के लिए अपना ब्रह्मास्त्र चला दिया । दोनों ब्रह्मास्त्र आकाश में एक दूसरे के सामने डट गये । इससे पूरे विश्व में हाहाकार मच गया । तब भगवान श्रीकृष्ण ने दोनों से कहा कि वे अपने अपने ब्रह्मास्त्र को वापस ले लें । अर्जुन तो वापस लेना जानता था इसलिए उसने वह ब्रह्मास्त्र वापस ले लिया लेकिन अश्वत्थामा ऐसा करना नहीं जानता था । इसलिए उसने इसे अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा पर छोड़ दिया जो कि नियम विरुद्ध था क्योंकि पहली बात तो यह थी कि उत्तरा गर्भवती थी । दूसरे वह एक महिला थी । एक गर्भवती महिला पर ब्रह्मास्त्र छोड़ना बहुत ही अधम स्तर का कार्य था लेकिन जब बुद्धि पर अज्ञान और मोह का परदा पड़ा जाये तो मनुष्य धर्म और अधर्म में भेद करने की शक्ति खो देता है । अब उत्तरा और पांडवों का भावी उत्तराधिकारी का जीवन संकट में था । तब भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में प्रवेश कर उसमें स्थित शिशु की रक्षा की और अपनी गदा से ब्रह्मास्त्र को लौटा दिया । इस प्रकार उत्तरा का गर्भ बच गया । उत्तरा ने एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया जो परीक्षित के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
इसके पश्चात अर्जुन ने अश्वत्थामा को पकड़ लिया और उसका वध करने वाला था कि उसे ध्यान आया कि अश्वत्थामा उसके गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र है । तब अर्जुन ने अश्वत्थामा की मणि काटकर उससे छीन ली और उसके घाव को खुला छोड़ दिया । अश्वत्थामा आज भी जीवित है क्योंकि वह बाल ब्रह्मचारी है और उसका घाव आज भी भरा नहीं है । उसके पाप का यही दंड था ।
इस प्रकार परीक्षित अर्जुन का पौत्र था जो कुरू वंश का एकमात्र उत्तराधिकारी था । सम्राट युधिष्ठिर के द्वारा राज पाट छोड़ने के पश्चात महाराज परीक्षित हस्तिनापुर का सम्राट बन गया । परीक्षित का विवाह विराटनगर के महाराज उत्तर की पुत्री इरावती से हुआ था और इनके पुत्र का नाम जनमेजय था जो परीक्षित के पश्चात भारत का सम्राट बना था ।
श्री हरि


