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#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 ##भगवद गीता🙏🕉️ #❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔
मेरे विचार - भवति धीमताम्। अथवा योगिनामेव ক্তুল एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्।१  वैराग्यवान् पुरुष उन लोकोंमें न जाकर अथवा जन्म लेता है | परन्तु ज्ञानवान् योगियोंके ही कुलमें इस प्रकारका जो यह जन्म है, सो संसारमें निःसन्देह ೯Il *? Il दुर्लभ अत्यन्त बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्। तत्र तं यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन।। वहाँ  उस पहले शरीरमें संग्रह किये हुए बुद्धि - संयोगको अर्थात् समबुद्धिरूप योगके संस्कारोंको अनायास ही प्राप्त होे जाता है और हे कुरुनन्दन ! उसके प्रभावसे वह फिर परमात्माकी प्राप्तिरूप सिद्धिके लिये पहलेसे भी बढ़कर प्रयत्न करता है Il ४३ Il पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोषपि सः| योगस्य   शब्दब्रह्मातिवर्तते ११ जिज्ञासुरपि श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाला योगभ्रष्ट वह पराधीन हुआ भी उस पहलेके अभ्याससे ही निःसन्देह भगवान्की ओर आकर्षित किया जाता है॰ तथा समबुद्धिरूप योगका  भी वेदमें कहे हुए सकाम  जिज्ञासु " कर्मोंके फलको उल्लंघन कर जाता है ।l ४४ Il श्रीमदभगवदगीता अध्याय 6 प्रेस , गोरखपुर से साभार যীলা भवति धीमताम्। अथवा योगिनामेव ক্তুল एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्।१  वैराग्यवान् पुरुष उन लोकोंमें न जाकर अथवा जन्म लेता है | परन्तु ज्ञानवान् योगियोंके ही कुलमें इस प्रकारका जो यह जन्म है, सो संसारमें निःसन्देह ೯Il *? Il दुर्लभ अत्यन्त बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्। तत्र तं यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन।। वहाँ  उस पहले शरीरमें संग्रह किये हुए बुद्धि - संयोगको अर्थात् समबुद्धिरूप योगके संस्कारोंको अनायास ही प्राप्त होे जाता है और हे कुरुनन्दन ! उसके प्रभावसे वह फिर परमात्माकी प्राप्तिरूप सिद्धिके लिये पहलेसे भी बढ़कर प्रयत्न करता है Il ४३ Il पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोषपि सः| योगस्य   शब्दब्रह्मातिवर्तते ११ जिज्ञासुरपि श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाला योगभ्रष्ट वह पराधीन हुआ भी उस पहलेके अभ्याससे ही निःसन्देह भगवान्की ओर आकर्षित किया जाता है॰ तथा समबुद्धिरूप योगका  भी वेदमें कहे हुए सकाम  जिज्ञासु " कर्मोंके फलको उल्लंघन कर जाता है ।l ४४ Il श्रीमदभगवदगीता अध्याय 6 प्रेस , गोरखपुर से साभार যীলা - ShareChat