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#Sandhya aaj udash h
Sandhya aaj udash h - पहले शिशु के मृत्युशोक से भरी हुई कोई माँ आँगन में बैठी खोईनसी वैसे ही बस संध्या आज उदास है रंग क्षितिज पर हैं कि चिता की लपटे हैं सूरज कापालिक समाधि में पैठ गया सन्नाटे का शासन है खंडहर मन पर का सब दर्द नसों में बैठ गया #Fu; पहली कश्ती माँझी के संग डूब गई कोई मझुअन तट पर बैठे खोईन्सी वैसे ही बस संध्या आज उदास है गोधूलि के संग उभरती व्याकुलता विहगों का कलरव क्रंदन बन जाता है अपशकुनी टिटहरी चीख़ती रह रह कर गीत अधर परही सिसकन बन जाता है फेरे फिर कर दूल्हे का दम ट्ूट गया उसकी विधवा दुलहन बैठे खोईनसी वैसे ही बस संध्या आज उदास है खपरैलों से धुआँ उठा है बल खाता मेरा भी तो मन भीतर ही सुलगा है सांध्य सितारा अंगारा बनकर निकला पहले शिशु के मृत्युशोक से भरी हुई कोई माँ आँगन में बैठी खोईनसी वैसे ही बस संध्या आज उदास है रंग क्षितिज पर हैं कि चिता की लपटे हैं सूरज कापालिक समाधि में पैठ गया सन्नाटे का शासन है खंडहर मन पर का सब दर्द नसों में बैठ गया #Fu; पहली कश्ती माँझी के संग डूब गई कोई मझुअन तट पर बैठे खोईन्सी वैसे ही बस संध्या आज उदास है गोधूलि के संग उभरती व्याकुलता विहगों का कलरव क्रंदन बन जाता है अपशकुनी टिटहरी चीख़ती रह रह कर गीत अधर परही सिसकन बन जाता है फेरे फिर कर दूल्हे का दम ट्ूट गया उसकी विधवा दुलहन बैठे खोईनसी वैसे ही बस संध्या आज उदास है खपरैलों से धुआँ उठा है बल खाता मेरा भी तो मन भीतर ही सुलगा है सांध्य सितारा अंगारा बनकर निकला - ShareChat