"स्वतंत्र पंथ"
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स्वतंत्र विचारों में डूबा मन,
कुछ इतना स्वतंत्र हो ऐंठे हैं।
सबकुछ हँसते खेलते बीते,
इन ख्वाबोँ में सिमटे बैठे हैं।
बस अच्छा हो अपने जीवन मे,
अक्सर यही सोचते रहते हैं।
ये अपनी जिंदगी है अपना मन,
बस अपने मन की ही करते हैं।
संस्था-संस्थान सभा संगठन,
सबके सब उलझे दिखते हैं।
जहाँ देखो बस औपचारिकता भर,
बाकी खाली फोटोशूट ही करते हैं।
विचारों के सागर में डूबी गंगा,
संस्कारों को यूँ परिभाषित करते हैं।
आबंध किसी को स्वीकार नही,
परबन्ध स्वभाव में डूबते उलझते हैं।1।
आजादी के मायने आजकल,
सबके समझ मे आता नही।
देशभक्ति और देशप्रेम पे,
हर व्यक्ति अक्सर इतराता नही।
कई साल कई दशक बीते,
आँखों मे थे तनिक चैन नही।
धन-धर्म तब सब कुंठित थे,
गुलाम साँसे भी थे बेचैन नही।
उंगलियाँ तोड़ दिए गए थे,
उद्योग शिल्प का था नाम नही।
बिक रहे थे केवल विदेशी,
स्वदेशी प्रतिबंधित कोई नाम नही।
जो कहे बोते थे जो कहे खाते थे,
अपने सभ्यता पे अभिमान नही।
नंगधरंग कर कूटे-पीटे जाते थे,
बचा था हरेक में स्वाभिमान नही।2।
सुंदर अबला नाजुक कली,
हर गली से खींच ली जाती थीं।
भाई-बाप हर विवश परिजन,
सबके सामने नोची-काटी जाती थीं।
बिखर रहे थे हर धर्मस्थल,
टूटती हुई हर शिखर-मीनारें थीं।
त्राहि-त्राहि चहुँ रोदन-क्रंदन,
हर जनजन की बनी निशानी थी।
कलवा देख कटते थे कलाई,
सिंदूर वाली चोली फटती थीं।
तिलक-जनेऊ-माला की गर्दन,
बिन बात ही हरदम कटती थीं।
दिन होते ही हर सुंदरी किशोरी,
कहीं छुपकर चूपकर रहती थीं।
स्वयं के धन-धर्म के रक्षा में,
बस खुन की नदियाँ बहती थीं।3।
आज झूम रहे हैं जो बाल शुलभ,
उनके अंडकोष निकाले जाते थे।
जो मान गए तो बनाए गए हिजड़े,
वर्ना सबके मुंडी ही काटे जाते थे।
हमारे देवों की टूटी प्रतिमाएँ,
खूनी जूतों से रगड़े जाते थे।
पंडे-पुजारी और शिक्षक-वैद,
सारे ही नंगेकर मसले जाते थे।
धारदार पत्तियाँ..मुलायम चमड़ी,
बेरहम जल्लादों से खिंचे जाते थे।
न रूह शरीर मे न साँसे तन में,
जब घण्टों कोड़ो से पिटे जाते थे।
इज्ज़त सम्मान कुछ बचा नही,
सब यूँ सहमे जहमे रहते थे।
सहमे जुबान या मरे हुए से,
बस आजादी के ख्यालों में रहते थे।4।
सीना फूल कर चौरी हो जाए,
अपने राष्ट्रधुन के संगम पे...
आँखें खुशी से झूम उठे,
देश के हर मंगल प्रगति पर।
अतः हे शिक्षकों है शिक्षितों,
डॉक्टरों वैद्यों और विद्वानों...
हे शिल्पकारों हे कलाप्रेमियों,
इंजीनियर आदि कामगारों।
हे बहनों भाभियों मौसी काकियों,
बुआ चाची खिलती बालिकाओं,
तुम्हरा उत्तरदायित्व सबसे ज्यादा,
राष्ट्रवाद के संस्कारों का उद्गार करो।
अपने स्वभाव में रहो भले ही,
पर आजाद देश पे अभिमान करो।
एक अनुशासन एक गरिमा हो,
ऐसे अनुभूति से देश से प्यार करो।5।
गुलामी के हर जंजीरों के,
टूटने पे ये उजियारा आया है।
छँटी अँधियारे की घटा घनेरी,
तब स्वतंत्र देश मुस्कुराया है।
परतंत्र बेरियों को काटकर,
देश प्रगतिपथ पे आया है।
सबसे अलग तरीके से खिलकर,
ये उन्नति यूँ गगन पे छाया है।
नमन करो इस धरती को,
ये भारत देश हमारा है।
जहाँ जन्मे और जहाँ बढ़े,
ये जन्मभूमि सबसे न्यारा है।
तन-मन-धन अभिन्न जिससे,
ये स्वतंत्र अधिकार हमारा है।
चूमो हरदम इस मिट्टी को,
जो प्राणों से बढ़कर प्यारा है।6।
मन प्रफुल्लित तन प्रफुल्लित,
ये स्वतंत्र सुंदर देश हमारा है।
सोने की चिड़िया सुवर्ण पथ पर,
पुनः पुनः ये नियति हमारा है।
काम करो कुछ ऐसे-ऐसे,
नव कँवल तुमपे अभिमान करें।
तुम्हारे आचरण का अनुसरण कर,
हर बच्चा-बच्चा देश से प्यार करे।
तीन रंगों का ये प्राणध्वज,
यूँ हृदय मध्य में आ जाए।
कहो भारत भूमि की जय हो,
उद्घोष गगन में छा जाए।
नमन करो इस धरती को,
ये भारत देश हमारा है।
चूमो हरदम इस मिट्टी को,
जो प्राणों से बढ़कर प्यारा है।7।💕💞
जो प्राणों से बढ़कर प्यारा है.....🇮🇳
....✍️रवि प्रताप सिंह("पंकज")🚩
🌳🌳🌳🌳मनमोहन🌳🌳🌳🌳
#नीला आसमान 🌌 #🌼 मेरा बगीचा 🌸 #🌼फूलों के पौधे🌱 #🐦Bird लवर #🎄हरे पेड़


