#जय श्री माँ नैना देवी जी #जय माँ नैना देवी
👁️ जहाँ गिरे थे माता सती के नेत्र: जय माँ नैना देवी! 🚩
नैना देवी मंदिर की दो प्रमुख कहानियाँ प्रचलित हैं। एक पौराणिक (शक्तिपीठ से जुड़ी) और दूसरी ऐतिहासिक (मंदिर निर्माण से जुड़ी)।
यहाँ विस्तार से दोनों कहानियाँ दी गई हैं:
1. शक्तिपीठ बनने की पौराणिक कथा (माता सती के नयन)
यह कथा भगवान शिव और माता सती से जुड़ी है, जो सभी शक्तिपीठों का आधार है:
दक्ष का अपमान: जब प्रजापति दक्ष ने कनखल (हरिद्वार) में विशाल यज्ञ किया, तो उन्होंने भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। माता सती अपने पिता के घर बिना बुलाए गईं, लेकिन वहाँ शिवजी का अपमान देखकर उन्होंने यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए।
शिव का तांडव: भगवान शिव सती के जलते हुए शरीर को कंधे पर उठाकर ब्रह्मांड में तांडव करने लगे। सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए।
नयनों का गिरना: मान्यता है कि माता सती के शरीर के अंग जहाँ-जहाँ गिरे, वहाँ शक्तिपीठ बने। हिमाचल के इस स्थान पर माता सती के 'नयन' (आंखें) गिरे थे।
नामकरण: चूँकि यहाँ माता के 'नयन' गिरे थे, इसलिए इस शक्तिपीठ का नाम 'नैना देवी' पड़ा। यहाँ पिंडी रूप में माता के नयनों की ही पूजा की जाती है।
2. मंदिर निर्माण की लोककथा (ग्वाला नैना गुर्जर)
मंदिर की खोज और निर्माण को लेकर एक बहुत प्रसिद्ध लोककथा है, जो एक गुर्जर (ग्वाले) से जुड़ी है:
बहुत समय पहले, इस पहाड़ी इलाके में 'नैना' नाम का एक गुर्जर अपनी गायें चराने आता था। उसने देखा कि उसकी गायों में से एक 'कपिला' गाय रोज एक विशेष जगह (एक पेड़ के नीचे या पत्थर पर) जाकर खड़ी हो जाती है और उसके थनों से अपने आप दूध की धारा बहने लगती है।
यह दृश्य कई दिनों तक चलता रहा। नैना गुर्जर को लगा कि शायद कोई जानवर गाय का दूध पी जाता है, लेकिन जब उसने छिपकर देखा तो पाया कि गाय एक पत्थर (पिंडी) पर दूध का अभिषेक कर रही थी।
उसी रात, नैना गुर्जर को सपने में माँ दुर्गा दिखाई दीं। माता ने उससे कहा, "मैं उसी स्थान पर पिंडी रूप में विराजमान हूँ, जहाँ तुम्हारी गाय दूध चढ़ाती है। वहाँ मेरा मंदिर बनवाओ।"
नैना गुर्जर ने यह बात उस समय के राजा बीर चंद (बिलासपुर के राजा) को बताई। राजा ने जब उस स्थान की खुदाई करवाई, तो वहाँ वास्तव में एक पिंडी मिली (जो माता के नेत्रों का प्रतीक थी)।
राजा ने वहाँ एक भव्य मंदिर बनवाया। माता ने प्रसन्न होकर वरदान दिया कि "यह स्थान मेरे नाम से पहले तुम्हारे नाम से जाना जाएगा।" इसीलिए इस धाम का नाम 'नैना' गुर्जर के नाम पर 'नैना देवी' पड़ा।
3. गुरु गोबिंद सिंह जी और नैना देवी
सिख इतिहास में भी इस स्थान का महत्व है। कहा जाता है कि सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने मुगलों से युद्ध करने से पहले इसी स्थान पर (या इसके निकट) एक महायज्ञ किया था और माँ भगवती (चंडी) से आशीर्वाद प्राप्त किया था। इसके बाद ही उन्होंने 'खालसा पंथ' की स्थापना की और अत्याचारी मुगलों का सामना किया।
मंदिर की विशेषताएँ
स्थान: यह मंदिर एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है, जहाँ से नीचे गोबिंद सागर झील (भाखड़ा नांगल बांध का जलाशय) का अद्भुत दृश्य दिखाई देता है।
पूजा: यहाँ माता की तीन पिंडियों की पूजा होती है—दाहिनी ओर माँ काली, मध्य में नैना देवी (शक्ति) और बाईं ओर भगवान गणेश।
त्योहार: नवरात्रों के दौरान यहाँ विशाल मेला लगता है।
सार:
नैना देवी मंदिर श्रद्धा और शक्ति का केंद्र है। जहाँ माता के नेत्र गिरे, वहाँ भक्तों को "दिव्य दृष्टि" और ज्ञान का आशीर्वाद मिलता है।
जय माँ नैना देवी! 🙏🚩


