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#महाभारत श्रीमहाभारतकथा-3️⃣3️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः माद्री के साथ पाण्डु का विवाह तथा राजा पाण्डु की दिग्विजय...(दिन 339) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ स राजा देवगर्भाभो विजिगीषुर्वसुंधराम् । हृष्टपुष्टबलैः प्रायात् पाण्डुः शत्रूननेकशः ।। २४ ।। राजा पाण्डु देवकुमारके समान तेजस्वी थे। उन्होंने इस पृथ्वीपर विजय पानेकी इच्छासे हृष्ट-पुष्ट सैनिकोंके साथ अनेक शत्रुओंपर धावा किया ।। २४ ।। पूर्वमागस्कृतो गत्वा दशार्णाः समरे जिताः । पाण्डुना नरसिंहेन कौरवाणां यशोभृता ।। २५ ।। कौरवकुलके सुयशको बढ़ानेवाले, मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी राजा पाण्डुने सबसे पहले पूर्वके अपराधी दशार्णोपर धावा करके उन्हें युद्धमें परास्त किया ।। २५ ।। ततः सेनामुपादाय पाण्डुर्नानाविधध्वजाम् । प्रभूतहस्त्यश्वयुतां पदातिरथसंकुलाम् ।। २६ ।। आगस्कारी महीपानां बहूनां बलदर्पितः । गोप्ता मगधराष्ट्रस्य दीर्घा राजगृहे हतः ।। २७ ।। तत्पश्चात् वे नाना प्रकारकी ध्वजा-पताकाओंसे युक्त और बहुसंख्यक हाथी, घोड़े, रथ एवं पैदलोंसे भरी हुई भारी सेना लेकर मगधदेशमें गये। वहाँ राजगृहमें अनेक राजाओंका अपराधी बलाभिमानी मगधराज दीर्घ उनके हाथसे मारा गया ।। २६-२७ ।। ततः कोशं समादाय वाहनानि च भूरिशः । पाण्डुना मिथिलां गत्वा विदेहाः समरे जिताः ।। २८ ।। उसके बाद भारी खजाना और वाहन आदि लेकर पाण्डुने मिथिला पर चढ़ाई की और विदेहवंशी क्षत्रियों को युद्ध में परास्त किया ।। २८ ।। तथा काशिषु सुह्येषु पुण्ड्रेषु च नरर्षभ । स्वबाहुबलवीर्येण कुरूणामकरोद् यशः ।। २९ ।। नरश्रेष्ठ जनमेजय! इस प्रकार वे पाण्डु काशी, सहा तथा पुण्ड्र देशों पर विजय पाते हुए अपने बाहुबल और पराक्रम से कुरुकुल के यश का विस्तार करने लगे ।। २९ ।। तं शरौघमहाच्वालं शस्त्रार्चिषमरिन्दमम् । पाण्डुपावकमासाद्य व्यदह्यन्त नराधिपाः ।। ३० ।। उस समय शत्रुदमन राजा पाण्डु प्रज्वलित अग्निके समान सुशोभित थे। बाणोंका समुदाय उनकी बढ़ती हुई ज्वालाके समान जान पड़ता था। खड्ग आदि शस्त्र लपटोंके समान प्रतीत होते थे। उनके पास आकर बहुतसे राजा भस्म हो गये ।। ३० ।। ते ससेनाः ससेनेन विध्वंसितबला तपाः । पाण्डुना वशगाः कृत्वा कुरुकर्मसु योजिताः ।। ३१ ।। सेनासहित राजा पाण्डु ने सामने आये हुए सैन्य सहित नरपतियों की सारी सेनाएँ नष्ट कर दीं और उन्हें अपने अधीन करके कौरवों के आज्ञापालन में नियुक्त कर दिया ।। ३१ ।। तेन ते निर्जिताः सर्वे पृथिव्यां सर्वपार्थिवाः । तमेकं मेनिरे शूरं देवेष्विव पुरंदरम् ।। ३२ ।। पाण्डु के द्वारा परास्त हुए समस्त भूपालगण देवताओं में इन्द्र की भाँति इस पृथ्वी पर सब मनुष्यों में एकमात्र उन्हीं को शूरवीर मानने लगे ।। ३२ ।। तं कृताञ्जलयः सर्वे प्रणता वसुधाधिपाः । उपाजग्मुर्धनं गृह्य रत्नानि विविधानि च ।। ३३ ।। भूतलके समस्त राजाओं ने उनके सामने हाथ जोड़कर मस्तक टेक दिये और नाना प्रकार के रत्न एवं धन लेकर उनके पास आये ।। ३३ ।। मणिमुक्ताप्रवालं च सुवर्ण रजतं बहु । गोरत्नान्यश्वरत्नानि रथरत्नानि कुञ्जरान् ।। ३४ ।। खरोष्ट्रमहिषीश्चैव यच्च किंचिदजाविकम् । कम्बलाजिनरत्नानि राङ्कवास्तरणानि च । तत् सर्वं प्रतिजग्राह राजा नागपुराधिपः ।। ३५ ।। राजाओंके दिये हुए ढेर-के-ढेर मणि, मोती, मूँगे, सुवर्ण, चाँदी, गोरत्न, अश्वरत्न, रथरत्न, हाथी, गदहे, ऊँट, भैंसें, बकरे, भेड़ें, कम्बल, मृगचर्म, रत्न, रंकु मृगके चर्मसे बने हुए बिछौने आदि जो कुछ भी सामान प्राप्त हुए, उन सबको हस्तिनापुराधीश राजा पाण्डुने ग्रहण कर लिया ।। ३४-३५ ।। तदादाय ययौ पाण्डुः पुनर्मुदितवाहनः । हर्षयिष्यन् स्वराष्ट्राणि पुरं च गजसाह्वयम् ।। ३६ ।। वह सब लेकर महाराज पाण्डु अपने राष्ट्रके लोगोंका हर्ष बढ़ाते हुए पुनः हस्तिनापुर चले आये। उस समय उनकी सवारीके अश्व आदि भी बहुत प्रसन्न थे ।। ३६ ।। शन्तनो राजसिंहस्य भरतस्य च धीमतः । प्रणष्टः कीर्तिजः शब्दः पाण्डुना पुनराहृतः ।। ३७ ।। राजाओंमें सिंहके समान पराक्रमी शन्तनु तथा परम बुद्धिमान् भरतकी कीर्ति-कथा जो नष्ट-सी हो गयी थी, उसे महाराज पाण्डुने पुनरुज्जीवित कर दिया ।। ३७ ।। ये पुरा कुरुराष्ट्राणि जहुः कुरुधनानि च । ते नागपुरसिंहेन पाण्डुना करदीकृताः ।। ३८ ।। जिन राजाओं ने पहले कुरुदेश के धन तथा कुरुराष्ट्र का अपहरण किया था, उनको हस्तिनापुर के सिंह पाण्डु ने करद बना दिया ।। ३८ ।। इत्यभाषन्त राजानो राजामात्याश्च संगताः । प्रतीतमनसो हृष्टाः पौरजानपदैः सह ।। ३९ ।। बहुत-से राजा तथा राजमन्त्री एकत्र होकर इस तरहकी बातें कर रहे थे। उनके साथ नगर और जनपदके लोग भी इस चर्चामें सम्मिलित थे। उन सबके हृदयमें पाण्डुके प्रति विश्वास तथा हर्षोल्लास छा रहा था ।। ३९ ।। प्रत्युद्ययुश्च तं प्राप्तं सर्वे भीष्मपुरोगमाः । ते नदूरमिवाध्वानं गत्वा नागपुरालयात् ।। ४० ।। आवृतं ददृशुर्हष्टा लोकं बहुविधैर्धनैः । नानायानसमानीतै रत्नैरुच्चावचैस्तदा ।। ४१ ।। हस्त्यश्वरथरत्नैश्च गोभिरुष्ट्रैस्तथाविभिः । नान्तं ददृशुरासाद्य भीष्मेण सह कौरवाः ।। ४२ ।। राजा पाण्डु जब नगरके निकट आये, तब भीष्म आदि सब कौरव उनकी अगवानीके लिये आगे बढ़ आये। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक देखा, राजा पाण्डु और उनका दल बड़े उत्साहके साथ आ रहे हैं। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो वे लोग हस्तिनापुरसे थोड़ी ही दूरतक जाकर वहाँसे लौट रहे हों। उनके साथ भाँति-भाँतिके धन एवं नाना प्रकारके वाहनोंपर लादकर लाये हुए छोटे-बड़े रत्न, श्रेष्ठ हाथी, घोड़े, रथ, गौएँ, ऊँट तथा भेंड़ आदि भी थे। भीष्मके साथ कौरवोंने वहाँ जाकर देखा, तो उस धन-वैभवका कहीं अन्त नहीं दिखायी दिया ।। ४०-४२ ।। सोऽभिवाद्य पितुः पादौ कौसल्यानन्दवर्धनः । यथार्ह मानयामास पौरजानपदानपि ।। ४३ ।। कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले पाण्डुने निकट आकर पितृव्य भीष्मके चरणोंमें प्रणाम किया और नगर तथा जनपदके लोगोंका भी यथायोग्य सम्मान किया ।। ४३ ।। प्रमृद्य परराष्ट्राणि कृतार्थ पुनरागतम् । पुत्रमाश्लिष्य भीष्मस्तु हर्षादश्रूण्यवर्तयत् ।। ४४ ।। शत्रुओंके राज्योंको धूलमें मिलाकर कृतकृत्य होकर लौटे हुए अपने पुत्र पाण्डुका आलिंगन करके भीष्मजी हर्षके आँसू बहाने लगे ।। ४४ ।। स तूर्यशतशङ्खानां भेरीणां च महास्वनैः। हर्षयन् सर्वशः पौरान् विवेश गजसाह्वयम् ।। ४५ ।। सैकड़ों शंख, तुरही एवं नगारों की तुमुल ध्वनि से समस्त पुरवासियों को आनन्दित करते हुए पाण्डु ने हस्तिनापुर में प्रवेश किया ।। ४५ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुदिग्विजये द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुदिग्विजयविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११२ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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