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#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक०७५ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण बालकाण्ड सत्तरवाँ सर्ग राजा जनकका अपने भाई कुशध्वजको सांकाश्या नगरीसे बुलवाना, राजा दशरथके अनुरोधसे वसिष्ठजीका सूर्यवंशका परिचय देते हुए श्रीराम और लक्ष्मणके लिये सीता तथा ऊर्मिलाको वरण करना तदनन्तर जब सबेरा हुआ और राजा जनक महर्षियोंके सहयोगसे अपना यज्ञ-कार्य सम्पन्न कर चुके, तब वे वाक्यमर्मज्ञ नरेश अपने पुरोहित शतानन्दजीसे इस प्रकार बोले—॥१॥ 'ब्रह्मन्! मेरे महातेजस्वी और पराक्रमी भाई कुशध्वज जो अत्यन्त धर्मात्मा हैं, इस समय इक्षुमती नदीका जल पीते हुए उसके किनारे बसी हुई कल्याणमयी सांकाश्या नगरीमें निवास करते हैं। उसके चारों ओरके परकोटोंकी रक्षाके लिये शत्रुओंके निवारणमें समर्थ बड़े-बड़े यन्त्र लगाये गये हैं। वह पुरी पुष्पकविमानके समान विस्तृत तथा पुण्यसे उपलब्ध होनेवाले स्वर्गलोकके सदृश सुन्दर है॥२-३॥ 'वहाँ रहनेवाले अपने भाईको इस शुभ अवसरपर मैं यहाँ उपस्थित देखना चाहता हूँ; क्योंकि मेरी दृष्टिमें वे मेरे इस यज्ञके संरक्षक हैं। महातेजस्वी कुशध्वज भी मेरे साथ श्रीसीता रामके विवाहसम्बन्धी इस मंगल समारोहका सुख उठावेंगे'॥४॥ राजाके इस प्रकार कहनेपर शतानन्दजीके समीप कुछ धीर स्वभावके पुरुष आये और राजा जनकने उन्हें पूर्वोक्त आदेश सुनाया॥५॥ राजाकी आज्ञासे वे श्रेष्ठ दूत तेज चलनेवाले घोड़ोंपर सवार हो पुरुषसिंह कुशध्वजको बुला लानेके लिये चल दिये। मानो इन्द्रकी आज्ञासे उनके दूत भगवान् विष्णुको बुलाने जा रहे हों॥६॥ सांकाश्यामें पहुँचकर उन्होंने कुशध्वजसे भेंट की और मिथिलाका यथार्थ समाचार एवं जनकका अभिप्राय भी निवेदन किया॥७॥ उन महावेगशाली श्रेष्ठ दूतोंके मुखसे मिथिलाका सारा वृत्तान्त सुनकर राजा कुशध्वज महाराज जनककी आज्ञाके अनुसार मिथिलामें आये॥८॥ वहाँ उन्होंने धर्मवत्सल महात्मा जनकका दर्शन किया। फिर शतानन्दजी तथा अत्यन्त धार्मिक जनकको प्रणाम करके वे राजाके योग्य परम दिव्य सिंहासनपर विराजमान हुए॥९½॥ सिंहासनपर बैठे हुए उन दोनों अमिततेजस्वी वीरबन्धुओंने मन्त्रिप्रवर सुदामनको भेजा और कहा—'मन्त्रिवर! आप शीघ्र ही अमित तेजस्वी इक्ष्वाकुकुलभूषण महाराज दशरथके पास जाइये और पुत्रों तथा मन्त्रियोंसहित उन दुर्जय नरेशको यहाँ बुला लाइये'॥१०-११½॥ आज्ञा पाकर मन्त्री सुदामन महाराज दशरथके खेमेमें जाकर रघुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले उन नरेशसे मिले और मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम करनेके पश्चात् इस प्रकार बोले—॥१२½॥ 'वीर अयोध्यानरेश! मिथिलापति विदेहराज जनक इस समय उपाध्याय और पुरोहितसहित आपका दर्शन करना चाहते हैं॥१३½॥ मन्त्रिवर सुदामनकी बात सुनकर राजा दशरथ ऋषियों और बन्धु-बान्धवोंके साथ उस स्थानपर गये जहाँ राजा जनक विद्यमान थे॥१४½॥ मन्त्री, उपाध्याय और भाई-बन्धुओंसहित राजा दशरथ, जो बोलनेकी कला जाननेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ थे, विदेहराज जनकसे इस प्रकार बोले—॥१५½॥ 'महाराज! आपको तो विदित ही होगा कि इक्ष्वाकुकुलके देवता ये महर्षि वसिष्ठजी हैं। हमारे यहाँ सभी कार्योंमें ये भगवान् वसिष्ठ मुनि ही कर्तव्यका उपदेश करते हैं और इन्हींकी आज्ञाका पालन किया जाता है॥१६½॥ 'यदि सम्पूर्ण महर्षियोंसहित विश्वामित्रजीकी आज्ञा हो तो ये धर्मात्मा वसिष्ठ ही पहले मेरी कुल-परम्पराका क्रमशः परिचय देंगे'॥१७½॥ यों कहकर जब राजा दशरथ चुप हो गये, तब वाक्यवेत्ता भगवान् वसिष्ठ मुनि पुरोहितसहित विदेहराजसे इस प्रकार बोले—॥१८½॥ 'ब्रह्माजीकी उत्पत्तिका कारण अव्यक्त है—ये स्वयम्भू हैं। नित्य, शाश्वत और अविनाशी हैं। उनसे मरीचिकी उत्पत्ति हुई। मरीचिके पुत्र कश्यप हैं, कश्यपसे विवस्वान्‌का और विवस्वान्से वैवस्वत मनुका जन्म हुआ॥१९-२०॥ 'मनु पहले प्रजापति थे, उनसे इक्ष्वाकु नामक पुत्र हुआ। उन इक्ष्वाकुको ही आप अयोध्याके प्रथम राजा समझें॥२१॥ 'इक्ष्वाकुके पुत्रका नाम कुक्षि था। वे बड़े तेजस्वी थे। कुक्षिसे विकुक्षि नामक कान्तिमान् पुत्रका जन्म हुआ॥२२॥ 'विकुक्षिके पुत्र महातेजस्वी और प्रतापी बाण हुए। बाणके पुत्रका नाम अनरण्य था। वे भी बड़े तेजस्वी और प्रतापी थे॥२३॥ 'अनरण्यसे पृथु और पृथुसे त्रिशंकुका जन्म हुआ। त्रिशंकुके पुत्र महायशस्वी धुन्धुमार थे॥२४॥ 'धुन्धुमारसे महातेजस्वी महारथी युवनाश्वका जन्म हुआ। युवनाश्वके पुत्र मान्धाता हुए, जो समस्त भूमण्डलके स्वामी थे॥२५॥ 'मान्धातासे सुसन्धि नामक कान्तिमान् पुत्रका जन्म हुआ। सुसन्धिके भी दो पुत्र हुए—ध्रुवसन्धि और प्रसेनजित्॥२६॥ 'ध्रुवसन्धिसे भरत नामक यशस्वी पुत्रका जन्म हुआ। भरतसे महातेजस्वी असितकी उत्पत्ति हुई॥२७॥ 'राजा असितके साथ हैहय, तालजङ्घ और शशबिन्दु—इन तीन राजवंशोंके लोग शत्रुता रखने लगे थे॥२८॥ 'युद्धमें इन तीनों शत्रुओंका सामना करते हुए राजा असित प्रवासी हो गये। वे अपनी दो रानियोंके साथ हिमालयपर आकर रहने लगे॥२९॥ 'राजा असितके पास बहुत थोड़ी सेना शेष रह गयी थी। वे हिमालयपर ही मृत्युको प्राप्त हो गये। उस समय उनकी दोनों रानियाँ गर्भवती थीं, ऐसा सुना गया है॥३०॥ 'उनमेंसे एक रानीने अपनी सौतका गर्भ नष्ट करनेके लिये उसे विषयुक्त भोजन दे दिया॥३०½॥ 'उस समय उस रमणीय एवं श्रेष्ठ पर्वतपर भृगुकुलमें उत्पन्न हुए महामुनि च्यवन तपस्यामें लगे हुए थे। हिमालयपर ही उनका आश्रम था। उन दोनों रानियोंमेंसे एक (जिसे जहर दिया गया था) कालिन्दीनामसे प्रसिद्ध थी। विकसित कमलदलके समान नेत्रोंवाली महाभागा कालिन्दी एक उत्तम पुत्र पानेकी इच्छा रखती थी। उसने देवतुल्य तेजस्वी भृगुनन्दन च्यवनके पास जाकर उन्हें प्रणाम किया॥३१-३३॥ 'उस समय ब्रह्मर्षि च्यवनने पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाली कालिन्दीसे पुत्र-जन्मके विषयमें कहा—'महाभागे! तुम्हारे उदरमें एक महान् बलवान्, महातेजस्वी और महापराक्रमी उत्तम पुत्र है, वह कान्तिमान् बालक थोड़े ही दिनोंमें गर (जहर) के साथ उत्पन्न होगा। अतः कमललोचने! तुम पुत्रके लिये चिन्ता न करो'॥३४-३५॥ 'वह विधवा राजकुमारी कालिन्दी बड़ी पतिव्रता थी। महर्षि च्यवनको नमस्कार करके वह देवी अपने आश्रमपर लौट आयी। फिर समय आनेपर उसने एक पुत्रको जन्म दिया॥३६॥ उसकी सौतने उसके गर्भको नष्ट कर देनेके लिये जो गर (विष) दिया था, उसके साथ ही उत्पन्न होनेके कारण वह राजकुमार 'सगर' नामसे विख्यात हुआ॥३७॥ 'सगरके पुत्र असमंज और असमंजके पुत्र अंशुमान् हुए। अंशुमान्‌के पुत्र दिलीप और दिलीपके पुत्र भगीरथ हुए॥३८॥ 'भगीरथसे ककुत्स्थ और ककुत्स्थसे रघुका जन्म हुआ। रघुके तेजस्वी पुत्र प्रवृद्ध हुए, जो शापसे राक्षस हो गये थे॥३९॥ 'वे ही कल्माषपाद नामसे भी प्रसिद्ध हुए थे। उनसे शङ्खण नामक पुत्रका जन्म हुआ था। शङ्खणके पुत्र सुदर्शन और सुदर्शनके अग्निवर्ण हुए॥४०॥ 'अग्निवर्णके शीघ्रग और शीघ्रगके पुत्र मरु थे। मरुसे प्रशुश्रुक और प्रशुश्रुकसे अम्बरीषकी उत्पत्ति हुई॥४१॥ 'अम्बरीषके पुत्र राजा नहुष हुए। नहुषके ययाति और ययातिके पुत्र नाभाग थे। नाभागके अज हुए। अजसे दशरथका जन्म हुआ। इन्हीं महाराज दशरथसे ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उत्पन्न हुए हैं॥४२-४३॥ 'इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न हुए राजाओंका वंश आदिकालसे ही शुद्ध रहा है। ये सब के सब परम धर्मात्मा, वीर और सत्यवादी होते आये हैं॥४४॥ 'नरश्रेष्ठ! नरेश्वर! इसी इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न हुए श्रीराम और लक्ष्मणके लिये मैं आपकी दो कन्याओंका वरण करता हूँ। ये आपकी कन्याओंके योग्य हैं और आपकी कन्याएँ इनके योग्य। अतः आप इन्हें कन्यादान करें'॥४५॥ *इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥७०॥* ###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
##श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५ - !! ओम नमो नारायणाय !! राम नाम रति राम गति, राम नाम बिस्वास सुमिरत सुभ मंगल कुसल , दुहुँ दिसि तुलसीदास  तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसका राम नाम में प्रेम है, राम ही जिसकी एकमात्र गति है और राम नाम में ही जिसका विश्वास है, उसके लिए राम नाम का स्मरण करने से ही दोनों ओर ।इस लोक में और परलोक में) शुभः मंगल और कुशल है। दोहावली, गोस्वामी तुलसीदासजी  !! ओम नमो नारायणाय !! राम नाम रति राम गति, राम नाम बिस्वास सुमिरत सुभ मंगल कुसल , दुहुँ दिसि तुलसीदास  तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसका राम नाम में प्रेम है, राम ही जिसकी एकमात्र गति है और राम नाम में ही जिसका विश्वास है, उसके लिए राम नाम का स्मरण करने से ही दोनों ओर ।इस लोक में और परलोक में) शुभः मंगल और कुशल है। दोहावली, गोस्वामी तुलसीदासजी - ShareChat