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गज़ल #✒ शायरी
✒ शायरी - शहरयार Ta रवानी   से नहीं   है থিকণা  কীৎ दरिया की  ப = =1 & रिश्ता # గౌౌ IH यूँ था किये क़ैद-ए-्ज़मानी से थे बेज़ार edl जिन्हें अब   सैर-ए-्मकानी से नहीं है फ़ुर्सत आए न सच्चाई पे उस  की বামা নী   যক্ষী ख़ाइफ़ कोई गुल अहद-ए-खिज़ानी से नहीं है दोहराता   नहीं   मैं भी॰ गए   लोगों की নান इस   दौर को निस्बत भी॰ कहानी से नहीं है कहते हैं मिरे हक़ में सुख़न -फ़हम बस इतना है   मुआ'नी शेरों में  जो   ख़ूबी से   नहीं   है Moiivatioral Vicleos Appl Want शहरयार Ta रवानी   से नहीं   है থিকণা  কীৎ दरिया की  ப = =1 & रिश्ता # గౌౌ IH यूँ था किये क़ैद-ए-्ज़मानी से थे बेज़ार edl जिन्हें अब   सैर-ए-्मकानी से नहीं है फ़ुर्सत आए न सच्चाई पे उस  की বামা নী   যক্ষী ख़ाइफ़ कोई गुल अहद-ए-खिज़ानी से नहीं है दोहराता   नहीं   मैं भी॰ गए   लोगों की নান इस   दौर को निस्बत भी॰ कहानी से नहीं है कहते हैं मिरे हक़ में सुख़न -फ़हम बस इतना है   मुआ'नी शेरों में  जो   ख़ूबी से   नहीं   है Moiivatioral Vicleos Appl Want - ShareChat