#संस्कृत सुभाषित
प्रीणाति य: सुचरितै: पितरं स पुत्रो
यद्भर्तुरेव हितमिच्छति तत्कलत्रम् ।
तन्मित्रमापदि सुखे च समक्रियं यद्
एतत्त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते ॥
[ किरातर्जुनीयम , सर्ग- ११ , श्लोक- ४० ]
अर्थात् 👉🏻 जो अपने सदाचरण से पिता को प्रसन्न/संतुष्ट रखे , वही वास्तव में पुत्र है । जो सदैव अपने पति की शुभेच्छु हो , वही पत्नी है । जो सुख-दुख में सदैव समान भाव रखे , वही वास्तविक मित्र है तथा ये तीनों उसी को प्राप्त होते हैं जिसने संसार में पुण्यकर्म किए हों ।
🌄🌄 प्रभातवन्दन 🌄🌄


