:::::प्रेम और स्त्री का मन....
स्त्री प्रेम में छल नहीं करती,
वह तो बस परिस्थितियों और अपने कर्तव्यों के बीच उलझ जाती है…
पहली बार…
जब प्रेम उसके जीवन में दस्तक देता है,
तो वह उसे पूरे मन से जीना चाहती है।
उसके हृदय में भावनाओं की एक निर्मल धारा बहती है,
परिवार की मर्यादाएँ और समाज की सीमाएँ
उसे खुलकर जीने नहीं देतीं।
वह छुपाती नहीं,
बस अपने हिस्से का प्रेम चुपचाप संजोती है…
और फिर…
जब प्रेम को पाने का समय आता है,
तब उसके सामने खड़े होते हैं
कर्तव्य, संस्कार और अपनों की उम्मीदें।
उसकी खामोशी को अक्सर छल समझ लिया जाता है,
पर सच तो यह है कि
वह खुद को तोड़कर
अपनों को जोड़ रही होती है…
वह वादे नहीं तोड़ती,
वह अपने सपनों को त्याग देती है…
वह प्रेम नहीं छोड़ती,
वह खुद को पीछे छोड़ देती है…
इसलिए स्त्री को दोषी ठहराना आसान है,
पर उसकी खामोशी के पीछे छुपे त्याग को समझना
हर किसी के बस की बात नहीं…
क्योंकि
स्त्री प्रेम में छल नहीं करती,
वह तो बस…
हर बार खुद से हारकर भी
अपनों को जीतने दे::::
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