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रुबाई जलालुद्दीन रुमी #सूफी काव्य
सूफी काव्य - रूबाई रोज़़ी कि तुरा ब-बीनम आदीना ए॰मा-अस्त हर रोज़ ब-दौलतत ब अज़़ देने एन्मा-अस्त चर्ख़ ओ ्हज़ार चर्ख़ दर TR कीना ए॰मा-अस्त ग़म नीस्त चू मेहर एन्यार दर सीना ए॰मास्त aTargf: जिस रोज़ से आसमान ने मुझे तुझसे जुदा किया, किसी ने मुझे कभी हँसते हुए नहीं देखा, तेरी जुदाई में दिल इतना ग़मगीन है कि इस का अंदाज़ा मुझे है या बस ख़ुदा को है। (जलालुद्दीन रूमी) Motivationat VideosApp Want रूबाई रोज़़ी कि तुरा ब-बीनम आदीना ए॰मा-अस्त हर रोज़ ब-दौलतत ब अज़़ देने एन्मा-अस्त चर्ख़ ओ ्हज़ार चर्ख़ दर TR कीना ए॰मा-अस्त ग़म नीस्त चू मेहर एन्यार दर सीना ए॰मास्त aTargf: जिस रोज़ से आसमान ने मुझे तुझसे जुदा किया, किसी ने मुझे कभी हँसते हुए नहीं देखा, तेरी जुदाई में दिल इतना ग़मगीन है कि इस का अंदाज़ा मुझे है या बस ख़ुदा को है। (जलालुद्दीन रूमी) Motivationat VideosApp Want - ShareChat