#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣3️⃣8️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः
माद्री के साथ पाण्डु का विवाह तथा राजा पाण्डु की दिग्विजय...(दिन 338)
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वैशम्पायन उवाच
ततः शान्तनवो भीष्मो राज्ञः पाण्डोर्यशस्विनः ।
विवाहस्यापरस्यार्थे चकार मतिमान् मतिम् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तदनन्तर शान्तनुनन्दन परम बुद्धिमान् भीष्मजीने यशस्वी राजा पाण्डुके द्वितीय विवाहके लिये विचार किया ।। १ ।।
सोऽमात्यैः स्थविरैः सार्थ ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः ।
बलेन चतुरङ्गेण ययौ मद्रपतेः पुरम ।। २ ।।
वे बूढ़े मन्त्रियों, ब्राह्मणों, महर्षियों तथा चतुरंगिणी सेनाके साथ मद्रराजकी राजधानीमें गये ।। २ ।।
तमागतमभिश्रुत्य भीष्मं बाह्लीकपुङ्गवः ।
प्रत्युद्गम्यार्चयित्वा च पुरं प्रावेशयन्नृपः ।। ३ ।।
बाह्लीकशिरोमणि राजा शल्य भीष्मजीका आगमन सुनकर उनकी अगवानीके लिये नगरसे बाहर आये और यथोचित स्वागत सत्कार करके उन्हें राजधानीके भीतर ले गये ।। ३ ।।
दत्त्वा तस्यासनं शुभ्रं पाद्यमर्घ्य तथैव च ।
मधुपर्क च महेशः पप्रच्छागमनेऽर्थिताम् ।। ४ ।।
वहाँ उनके लिये सुन्दर आसन, पाद्य, अर्घ्य तथा मधुपर्क अर्पण करके मद्रराज ने भीष्मजी से उनके आगमन का प्रयोजन पूछा ।। ४ ।।
तं भीष्मः प्रत्युवाचेदं मद्रराजं कुरूद्वहः ।
आगतं मां विजानीहि कन्यार्थिनमरिन्दम ।। ५ ।।
तब कुरुकुलका भार वहन करनेवाले भीष्मजीने मद्रराजसे इस प्रकार कहा
- 'शत्रुदमन ! तुम मुझे कन्या के लिये आया हुआ समझो ।। ५ ।।
श्रूयते भवतः साध्वी स्वसा माद्री यशस्विनी ।
तामहं वरयिष्यामि पाण्डोरर्थे यशस्विनीम् ।। ६ ।।
'सुना है, तुम्हारी एक यशस्विनी बहिन है, जो बड़े साधु स्वभावकी है; उसका नाम माद्री है। मैं उस यशस्विनी माद्रीका अपने पाण्डुके लिये वरण करता हूँ ।। ६ ।।
युक्तरूपो हि सम्बन्धे त्वं नो राजन् वयं तव ।
एतत् संचिन्त्य मद्रेश गृहाणास्मान् यथाविधि ।। ७ ।।
'राजन्! तुम हमारे यहाँ सम्बन्ध करनेके सर्वथा योग्य हो और हम भी तुम्हारे योग्य हैं। मद्रेश्वर ! यों विचारकर तुम हमें विधिपूर्वक अपनाओ' ।। ७ ।।
तमेवंवादिनं भीष्मं प्रत्यभाषत मद्रपः । न हि मेऽन्यो वरस्त्वत्तः श्रेयानिति मतिर्मम ।। ८ ।।
भीष्मजीके यों कहनेपर मद्रराजने उत्तर दिया- 'मेरा विश्वास है कि आपलोगोंसे श्रेष्ठ वर मुझे ढूँढ़नेसे भी नहीं मिलेगा' ।। ८ ।।
पूर्वैः प्रवर्तितं किंचित् कुलेऽस्मिन् नृपसत्तमैः । साधु वा यदि वासाधु तन्नातिक्रान्तुमुत्सहे ।। ९ ।।
'परंतु इस कुलमें पहलेके श्रेष्ठ राजाओंने कुछ शुल्क लेनेका नियम चला दिया है। वह अच्छा हो या बुरा, मैं उसका उल्लंघन नहीं कर सकता ।। ९ ।।
व्यक्तं तद् भवतश्चापि विदितं नात्र संशयः । न च युक्तं तथा वक्तुं भवान् देहीति सत्तम ।। १० ।।
'यह बात सबपर प्रकट है, निःसंदेह आप भी इसे जानते होंगे। साधुशिरोमणे ! इस दशामें आपके लिये यह कहना उचित नहीं है कि मुझे कन्या दे दो' ।। १० ।।
कुलधर्मः स नो वीर प्रमाणं परमं च तत् ।
तेन त्वां न ब्रवीम्येतदसंदिग्धं वचोऽरिहन् ।। ११ ।।
'वीर! वह हमारा कुलधर्म है और हमारे लिये वही परम प्रमाण है। शत्रुदमन ! इसीलिये मैं आपसे निश्चितरूपसे यह नहीं कह पाता कि कन्या दे दूँगा' ।। ११ ।।
तं भीष्मः प्रत्युवाचेदं मद्रराजं जनाधिपः । धर्म एष परो राजन् स्वयमुक्तः स्वयम्भुवा ।। १२ ।।
यह सुनकर जनेश्वर भीष्मजीने मद्रराजको इस प्रकार उत्तर दिया- 'राजन् ! यह उत्तम धर्म है। स्वयं स्वयम्भू ब्रह्माजीने इसे धर्म कहा है' ।। १२ ।।
नात्र कश्चन दोषोऽस्ति पूर्वैधिरयं कृतः ।
विदितेय च ते शल्य मर्यादा साधुसम्मता ।। १३ ।।
'यदि तुम्हारे पूर्वजोंने इस विधिको स्वीकार कर लिया है तो इसमें कोई दोष नहीं है। शल्य ! साधु पुरुषोंद्वारा सम्मानित तुम्हारी यह कुलमर्यादा हम सबको विदित है' ।। १३ ।।
इत्युक्त्वा स महातेजाः शातकुम्भं कृताकृतम् । रत्नानि च विचित्राणि शल्यायादात् सहस्रशः ।। १४ ।।
गजानश्वान् रथांश्चैव वासांस्याभरणानि च।
मणिमुक्ताप्रवालं च गाङ्गेयो व्यसृञ्जच्छूभम् ।। १५ ।।
यह कहकर महातेजस्वी भीष्मजीने राजा शल्यको सोना और उसके बने हुए आभूषण तथा सहस्रों विचित्र प्रकारके रत्न भेंट किये। बहुत-से हाथी, घोड़े, रथ, वस्त्र, अलंकार तथा मणि-मोती और मूँगे भी दिये ।। १४-१५ ।।
तत् प्रगृह्य धनं सर्वं शल्यः सम्प्रीतमानसः।
ददौ तां समलंकृत्य स्वसारं कौरवर्षभे ।। १६ ।।
वह सारा धन लेकर शल्य का चित्त प्रसन्न हो गया। उन्होंने अपनी बहिन को वस्त्राभूषणों से विभूषित करके राजा पाण्डुके लिये कुरुश्रेष्ठ भीष्मजी को सौंप दिया ।। १६ ।।
स तां माद्रीमुपादाय भीष्मः सागरगासुतः।
आजगाम पुरीं धीमान् प्रविष्टो गजसाह्वयम् ।। १७ ।।
परम बुद्धिमान् गंगानन्दन भीष्म माद्री को लेकर हस्तिनापुर में आये ।। १७ ।।
तत इष्टेऽहनि प्राप्ते मुहूर्ते साधुसम्मते ।
जग्राह विधिवत् पाणिं माद्रयाः पाण्डुर्नराधिपः ।। १८ ।।
तदनन्तर श्रेष्ठ ब्राह्मणों के द्वारा अनुमोदित शुभ दिन और सुन्दर मुहूर्त आने पर राजा पाण्डुने माद्री का विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया ।। १८ ।।
ततो विवाहे निर्वृत्ते स राजा कुरुनन्दनः ।
स्थापयामास तां भार्या शुभे वेश्मनि भाविनीम् ।। १९ ।।
इस प्रकार विवाह-कार्य सम्पन्न हो जानेपर कुरुनन्दन राजा पाण्डुने अपनी कल्याणमयी भार्याको सुन्दर महलमें ठहराया ।। १९ ।।
स ताभ्यां व्यचरत् सार्धं भार्याभ्यां राजसत्तमः ।
कुन्त्या माद्रया च राजेन्द्रो यथाकामं यथासुखम् ।। २० ।।
राजाओंमें श्रेष्ठ महाराज पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों कुन्ती और माद्रीके साथ आनन्दपूर्वक यथेष्ट विहार करने लगे ।। २० ।।
ततः स कौरवो राजा विहृत्य त्रिदशा निशाः ।
जिगीषया महीं पाण्डुर्निरक्रामत् पुरात् प्रभो ।। २१ ।।
जनमेजय ! कुरुवंशी राजा पाण्डु तीस रात्रियोंतक विहार करके समूची पृथ्वीपर विजय प्राप्त करनेकी इच्छा लेकर राजधानीसे बाहर निकले ।। २१ ।।
स भीष्मप्रमुखान् वृद्धानभिवाद्य प्रणम्य च ।
धृतराष्ट्रं च कौरव्यं तथान्यान् कुरुसत्तमान् । आमन्त्र्य प्रययौ राजा तैश्चैवाप्यनुमोदितः ।। २२ ।।
मङ्गलाचारयुक्ताभिराशीर्भिरभिनन्दितः ।
गजवाजिरथीघेन बलेन महतागमत् ।। २३ ।।
उन्होंने भीष्म आदि बड़े-बूढ़ों के चरणों में मस्तक झुकाया। कुशनन्दन धृतराष्ट्र तथा अन्य मिलने पर मंगलाचारयुत्ह आशीर्वादों से अभिनन्दित हो हाथी, घोड़ों तथा रथसमुदाय से युक्त विशाल सेना के साथ प्रस्थान किया ।। २२-२३ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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