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रुबाई जलालुद्दीन रूमी #सूफी काव्य
सूफी काव्य - "रुबाई ' ಖ೯ कि शुद वमा तन्हा दर दरियाई करानः-अश ना-पैदा ओ-शब ओ ग़म्मा ओनमा कश्ती , मीरानीम दर बहर ए खुदा ब-फ़ज़्ल ओ तौफ़ीक़ ए ख़ुदा भावार्थः अफ़्सोस कि ग़ुरूब ए आफ़्ताब का वक़्त है और हम तन्हा हैं ऐसे दरिया के अंदर हैं जिसका कोई किनारा नहीं है कश्ती है, रात है, बादल है और हम समुंद्र में ख़ुदा की तौफ़ीक़ और फ़ज़्ल से कश्ती चला रहे हैं (जलालुद्दीन रूमी) Want ' Motivational Videos App "रुबाई ' ಖ೯ कि शुद वमा तन्हा दर दरियाई करानः-अश ना-पैदा ओ-शब ओ ग़म्मा ओनमा कश्ती , मीरानीम दर बहर ए खुदा ब-फ़ज़्ल ओ तौफ़ीक़ ए ख़ुदा भावार्थः अफ़्सोस कि ग़ुरूब ए आफ़्ताब का वक़्त है और हम तन्हा हैं ऐसे दरिया के अंदर हैं जिसका कोई किनारा नहीं है कश्ती है, रात है, बादल है और हम समुंद्र में ख़ुदा की तौफ़ीक़ और फ़ज़्ल से कश्ती चला रहे हैं (जलालुद्दीन रूमी) Want ' Motivational Videos App - ShareChat