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⁉️ हमारे अंदर से "मैं" वाली भावना पूर्णतः कैसे निकले ?⁉️ ✍️जैसे काम शुरू करने से पहले मन में समर्पण भाव तो रहता है की गुरु भगवान के चरणों में समर्पित करके ये कार्य करना है, पर end में आते आते वो "मैं" वाली भावना आ ही जाती है की प्रशंसा हो या कोई attention दे।✍️ 🙏🙏यही "मैं" ही तो जीवों के सभी समस्याओं का मूलभूत कारण है । यह भाव कि यह मैंने किया है , मैं पन लाता है । हम जब स्वयं को सब कुछ मान लेते हैं , कर्ता मान लेते हैं , तभी यह मैं पने की भावना और स्वयं को प्रसंशित होने की भावना का जन्म होता है । इसका अर्थ है हम स्वयं को हर कार्य के लिए कर्ता मान रहे हैं और जब स्वयं को कर्ता मानेंगे तो यश , स्वयं के सम्मान की चाह रहेगी ही रहेगी । जिस समय हम स्वयं को कर्ता न मानकर , सब कुछ भगवान को अर्पण करते हुए और स्वयं को भगवान का निमित्त मानकर चलेंगे तो कभी भी यह अहम भावना आड़े नहीं आएगी । देखिये हम जो कुछ भी करते हैं , वह सदा सदा के लिए तब तक रहेगा जब तक वह अपना फल नहीं दे देता ।🙏🙏 Its kind of energy , which can never be destroyed but can be tranformed into one form to another. 🌷तो ऐसे ही हम जो भी कार्य करते हैं , चाहे दान हो , या कोई भी कार्य , उसका फल हमें इस ब्रह्मांड में मिलकर रहेगा , कोई माई का लाल क्या स्वयं भगवान भी इसमें कुछ नहीं कर सकते । तो मान लिया हमने दान किया । अब उसका फल मिलेगा ही मिलेगा । या तो सबसे बताकर उसे यश में परिवर्तित कर ले लीजिए या तो फिर उसे bank में FD करवा दीजिये , समय आने पर वह अपना फल देगा ही देगा और जितना अधिक देर से देगा , वह उतना ही अधिक प्रचुर मात्रा में मिलेगा ।🌷 ✍️जैसे आपने काम किया । आपको salary मिली । अब उस salary के पैसे से चाहे आप कुछ भी खरीद कर burger pizza से लेकर दारू से लेकर सब समाप्त कर दें या तो फिर उसको जमा कर दें FD में । तो समय आने पर उसका आपको कई गुना प्राप्त होगा और अगर उसको निष्काम भाव से कर रहे हैं तो फिर वह भागवदिक लाभ देगा । तो कर्ता भाव समाप्त करने से और सब भगवान को अर्पण करते हुए , स्वयं को मात्र निमित्त मानकर चलने से यह भावना या लोकरंजन की भावना स्वतः ही समाप्त हो जाएगी ।✍️ #❤️जीवन की सीख #☝आज का ज्ञान
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