#महाभारत
श्रीमहाभारतम्
〰️〰️🌼〰️〰️
।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
शततमोऽध्यायः
शान्तनु के रूप, गुण और सदाचार की प्रशंसा, गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति तथा देवव्रत की भीष्म-प्रतिज्ञा...(दिन 314)
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
वैशम्पायन उवाच
तस्यैतन्मतमाज्ञाय सत्यधर्मपरायणः । प्रत्यजानात् तदा राजन् पितुः प्रियचिकीर्षया ।। ९३ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! निषादराजके इस अभिप्रायको समझकर सत्यधर्ममें तत्पर रहनेवाले कुमार देवव्रतने उस समय पिताका प्रिय करनेकी इच्छासे यह कठोर प्रतिज्ञा की ।। ९३ ।।
गाङ्गेय उवाच
दाशराज निबोधेदं वचनं मे नरोत्तम । (ऋषयो वाथवा देवा भूतान्यन्तर्हितानि च । यानि यानीह शृण्वन्तु नास्ति वक्ता हि मत्समः ।।
इदं वचनमादत्स्व सत्येन मम जल्पतः ।) शृण्वतां भूमिपालानां यद् ब्रवीमि पितुः कृते ।। ९४ ।।
भीष्मने कहा- नरश्रेष्ठ निषादराज ! मेरी यह बात सुनो। जो-जो ऋषि, देवता एवं अन्तरिक्षके प्राणी यहाँ हों, वे सब भी सुनें। मेरे समान वचन देनेवाला दूसरा नहीं है। निषाद ! मैं सत्य कहता हूँ, पिताके हितके लिये सब भूमिपालोंके सुनते हुए मैं जो कुछ कहता हूँ, मेरी इस बातको समझो ।। ९४ ।।
राज्यं तावत् पूर्वमेव मया त्यक्तं नराधिपाः । अपत्यहेतोरपि च करिष्येऽद्य विनिश्चयम् ।। ९५ ।।
राजाओ! राज्य तो मैंने पहले ही छोड़ दिया है; अब संतानके लिये भी अटल निश्चय कर रहा हूँ ।। ९५ ।।
अद्यप्रभृति मे दाश ब्रह्मचर्यं भविष्यति । अपुत्रस्यापि मे लोका भविष्यन्त्यक्षया दिवि ।। ९६ ।।
निषादराज ! आजसे मेरा आजीवन अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत चलता रहेगा। मेरे पुत्र न होनेपर भी स्वर्गमें मुझे अक्षय लोक प्राप्त होंगे ।। ९६ ।।
(न हि जन्मप्रभृत्युक्तं मम किंचिदिहानृतम् ।
यावत् प्राणा ध्रियन्ते वै मम देहं समाश्रिताः ।।
तावन्न जनयिष्यामि पित्रे कन्यां प्रयच्छ मे । परित्यजाम्बहं राज्यं मैथुनं चापि सर्वशः ।। ऊध्वरता भविष्यामि दाश सत्यं ब्रवीमि ते ।)
मैंने जन्मसे लेकर अबतक कोई झूठ बात नहीं कही है। जबतक मेरे शरीरमें प्राण रहेंगे, तबतक मैं संतान नहीं उत्पन्न करूँगा। तुम पिताजीके लिये अपनी कन्या दे दो। दाश ! मैं राज्य तथा मैथुनका सर्वथा परित्याग करूँगा और ऊध्र्वरता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) होकर रहूँगा- यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।
वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सम्प्रहृष्टतनूरुहः ।
ददानीत्येव तं दाशो धर्मात्मा प्रत्यभाषत ।। ९७ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- देवव्रतका यह वचन सुनकर धर्मात्मा निषादराजके रोंगटे खड़े हो गये। उसने तुरंत उत्तर दिया- 'मैं यह कन्या आपके पिताके लिये अवश्य देता हूँ' ।। ९७ ।।
ततोऽन्तरिक्षेऽप्सरसो देवाः सर्षिगणास्तदा । अभ्यवर्षन्त कुसुमैर्भीष्मोऽयमिति चाब्रुवन् ।। ९८ ।।
उस समय अन्तरिक्षमें अप्सरा, देवता तथा ऋषिगण फूलोंकी वर्षा करने लगे और बोल उठे-'ये भयंकर प्रतिज्ञा करनेवाले राजकुमार भीष्म हैं (अर्थात् भीष्मके नामसे इनकी ख्याति होगी)' ।। ९८ ।।
ततः स पितुरर्थाय तामुवाच यशस्विनीम् । अधिरोह रथं मातर्गच्छावः स्वगृहानिति ।। ९९ ।।
तत्पश्चात् भीष्म पिताके मनोरथकी सिद्धिके लिये उस यशस्विनी निषादकन्यासे बोले - 'माताजी ! इस रथपर बैठिये। अब हमलोग अपने घर चलें' ।। ९९ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु भीष्मस्तां रथमारोप्य भाविनीम् ।
आगम्य हास्तिनपुरं शान्तनोः संन्यवेदयत् ।। १०० ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! ऐसा कहकर भीष्मने उस भामिनीको रथपर बैठा लिया और हस्तिनापुर आकर उसे महाराज शान्तनुको सौंप दिया ।। १०० ।।
तस्य तद् दुष्करं कर्म प्रशशंसुर्नराधिपाः ।
समेताश्च पृथक् चैव भीष्मोऽयमिति चाब्रुवन् ।। १०१ ।।
उनके इस दुष्कर कर्मकी सब राजालोग एकत्र होकर और अलग-अलग भी प्रशंसा करने लगे। सबने एक स्वरसे कहा, 'यह राजकुमार वास्तवमें भीष्म है' ।। १०१ ।।
नच्छ्रुत्वा दुष्करं कर्म कृतं भीष्मेण शान्तनुः । स्वच्छन्दमरणं तुष्टो ददौ तस्मै महात्मने ।। १०२ ।।
भीष्मके द्वारा किये हुए उस दुष्कर कर्मकी बात सुनकर राजा शान्तनु बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने उन महात्मा भीष्मको स्वच्छन्द मृत्युका वरदान दिया ।। १०२ ।।
न ते मृत्युः प्रभविता यावज्जीवितुमिच्छसि । त्वत्तो ह्यनुज्ञां सम्प्राप्य मृत्युः प्रभवितानघ ।। १०३ ।।
वे बोले- 'मेरे निष्पाप पुत्र ! तुम जबतक यहाँ जीवित रहना चाहोगे, तबतक मृत्यु तुम्हारे ऊपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। तुमसे आज्ञा लेकर ही मृत्यु तुमपर अपना प्रभाव प्रकट कर सकती है' ।। १०३ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि सत्यवतीलाभोपाख्याने शततमोऽध्यायः ।। १०० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें सत्यवतीलाभोपाख्यानविषयक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०० ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️


