#जय श्री कृष्ण
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण की बसाई हुई नगरी द्वारिका का अंत किसी प्राकृतिक आपदा मात्र से नहीं, बल्कि श्रापों के एक जाल और यादवों के अहंकार के कारण हुआ था। यह कहानी शक्ति के पतन और समय के चक्र की एक मार्मिक सीख है।
कथा की शुरुआत तब होती है जब द्वारिका अपने वैभव के चरम पर थी। एक दिन महर्षि विश्वामित्र, कण्व और देवर्षि नारद द्वारिका पधारे। कृष्ण के पुत्र साम्ब और उनके मित्रों ने ऋषियों के साथ उपहास करने की सोची।
साम्ब को स्त्री के वेश में सजाया गया और उसके पेट पर एक मूसल (लोहे का यंत्र) बांध दिया गया। वे ऋषियों के पास गए और पूछा, "हे ऋषिवर, यह स्त्री गर्भवती है, बताइए इसके गर्भ से क्या उत्पन्न होगा?"
ऋषियों ने अपने तपोबल से इस अपमान को जान लिया और क्रोधित होकर श्राप दिया:
"इसके गर्भ से एक ऐसा लोहे का मूसल पैदा होगा, जो पूरे यदुवंश के विनाश का कारण बनेगा।"
अगले ही दिन साम्ब के पेट से सचमुच एक लोहे का मूसल निकला। यादव भयभीत हो गए। राजा उग्रसेन ने आदेश दिया कि इस मूसल को पीसकर उसका चूर्ण समुद्र में फेंक दिया जाए। यादवों ने ऐसा ही किया, लेकिन उसका एक छोटा सा टुकड़ा रह गया जिसे एक मछली निगल गई। बाकी चूर्ण समुद्र के किनारे लहरों के साथ जमा हो गया और वहां 'एरका' नाम की लंबी और धारदार घास उग आई।
महाभारत युद्ध के अंत में, जब गांधारी ने अपने सौ पुत्रों के शव देखे, तो उन्होंने श्री कृष्ण को इसका उत्तरदायी माना। उन्होंने कृष्ण को श्राप दिया कि:
जिस प्रकार कुरुवंश का नाश हुआ है, उसी प्रकार तुम्हारे यदुवंश का भी विनाश होगा।
कृष्ण ने मुस्कुराहट के साथ इसे स्वीकार किया, क्योंकि वे जानते थे कि यादव अब इतने शक्तिशाली और अहंकारी हो चुके थे कि उन्हें कोई बाहरी शत्रु नहीं हरा सकता था। उनका अंत स्वयं उनके भीतर से ही होना था।
36 वर्ष बीतने के बाद, द्वारिका में अपशकुन होने लगे। कृष्ण ने सभी यादवों को तीर्थ यात्रा पर प्रभास क्षेत्र (वर्तमान सोमनाथ के पास) जाने का आदेश दिया। वहां यादवों ने मदिरापान किया और नशे में एक-दूसरे का अपमान करने लगे।
पुरानी शत्रुताओं को लेकर विवाद इतना बढ़ा कि उन्होंने समुद्र किनारे उगी वही 'एरका' घास उखाड़ ली। ऋषियों के श्राप के कारण वह घास लोहे के मूसल की तरह कठोर और घातक बन गई थी। यादवों ने उसी घास से एक-दूसरे पर प्रहार किया और देखते ही देखते पूरा यदुवंश आपस में लड़कर समाप्त हो गया। कृष्ण और बलराम के देखते ही देखते उनके पुत्र और पौत्र सभी काल के गाल में समा गए।
बलराम ने योग के माध्यम से देह त्याग दिया। श्री कृष्ण एक पीपल के पेड़ के नीचे विश्राम कर रहे थे। तभी 'जरा' नामक एक शिकारी (जो पूर्व जन्म में बाली था) ने कृष्ण के पैर को मृग की आंख समझकर विषैला तीर मार दिया। यह वही तीर था जिसकी नोक उस मछली के पेट से निकले मूसल के लोहे के टुकड़े से बनी थी।
कृष्ण के बैकुंठ प्रस्थान करते ही अर्जुन द्वारिका पहुंचे। उन्होंने बचे हुए वृद्धों, स्त्रियों और बच्चों को वहां से निकाला। जैसे ही अर्जुन द्वारिका की सीमा से बाहर निकले, समुद्र उमड़ पड़ा और देखते ही देखते सोने की नगरी द्वारिका पूरी तरह सागर में डूब गई।
द्वारिका का डूबना इस सत्य का प्रतीक है कि अधर्म और अहंकार चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, समय आने पर उसे नष्ट होना ही पड़ता है।


