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👌 જીવનની શીખ - श्रीमद्ननवद्नोता श्लोक अध्याय 5 6 . उद्धरेदात्मनाडत्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।l  सरल अर्थः  मनुष्य को चाहिए कि वह स्वयं अपने आप को ऊपर उठाए, अपने आप को गिरने न दे। क्योंकि मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र भी वही है और सबसे बड़ा शत्रु भी वही। श्रीकृष्ण मनुष्य को एक व्याख्याः इस श्लोक में सच्चाई बताते हैं। 76& लिए अपनी असफलताओं के अक्सर কম परिस्थितियों   लोगों भाग्य को दोष देते हैं। যা लेकिन सच यह है कि हमारा मन ही हमें ऊपर उठाता भी है और गिराता भी है। अनुशासित और सही दिशा में जब मन सकारात्मक, होता है, तो वही हमारा सबसे dకT सहायक बन जाता है। लेकिन जब मन नकारात्मक विचारों और आलस्य में फँस जाता है, तो वही हमारा सबसे बड़ा शत्रु बन जाता 81 जीवन की असली लड़ाई दुनिया से नहीं, अपने मन से होती है। ।। राधे राधे ।। श्रीमद्ननवद्नोता श्लोक अध्याय 5 6 . उद्धरेदात्मनाडत्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।l  सरल अर्थः  मनुष्य को चाहिए कि वह स्वयं अपने आप को ऊपर उठाए, अपने आप को गिरने न दे। क्योंकि मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र भी वही है और सबसे बड़ा शत्रु भी वही। श्रीकृष्ण मनुष्य को एक व्याख्याः इस श्लोक में सच्चाई बताते हैं। 76& लिए अपनी असफलताओं के अक्सर কম परिस्थितियों   लोगों भाग्य को दोष देते हैं। যা लेकिन सच यह है कि हमारा मन ही हमें ऊपर उठाता भी है और गिराता भी है। अनुशासित और सही दिशा में जब मन सकारात्मक, होता है, तो वही हमारा सबसे dకT सहायक बन जाता है। लेकिन जब मन नकारात्मक विचारों और आलस्य में फँस जाता है, तो वही हमारा सबसे बड़ा शत्रु बन जाता 81 जीवन की असली लड़ाई दुनिया से नहीं, अपने मन से होती है। ।। राधे राधे ।। - ShareChat