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#✍मेरे पसंदीदा लेखक #👉 लोगों के लिए सीख👈 #❤️जीवन की सीख #😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख
✍मेरे पसंदीदा लेखक - समर्पण जिसे कहते हैं॰ वह सर्वतोभावेन ईश्वर के समक्ष अपनी अहंवृत्ति को सौंपकर, मुक्त भाव से एवं सच्चे हृदय से उसके कार्य को करने का எT8ர है । समर्पण में नहीं होती ತಾ कुचेष्टा होता है, वह ईश्वर के समक्ष ही होता है बुद्धि अर्पित करके होता है। ऐसा समर्पण जहाँ क्ोगाव वहाँ पर भीतरी आनंद और संतोषपूर्ण उल्लास कभी कमी नहीं आने मन अविचल பரரி भाव से ईश्वर के अंतर्नाद को सुनेगा तथा चेतना फिर कभी विभ्रमित नहीं होे सकेगी इसे ही समर्पण कहते हैं पूजा- उपचार वाला समर्पण नहीं, येन-केन प्रकारेण ईश्वर के समक्ष माथा टेक देने वाला नहीं , तथा उसे अपने व्यवहार में न उतार मात्र बाह्य गतिविधियों तक सीमित ईश्वर मिलता है हृदय की तीव्र रखने वाला नहीं उत्कंठा द्वारा, उसे प्रत्येक कार्य का आधार बनाकर जीवन जीने से। समर्पण जिसे कहते हैं॰ वह सर्वतोभावेन ईश्वर के समक्ष अपनी अहंवृत्ति को सौंपकर, मुक्त भाव से एवं सच्चे हृदय से उसके कार्य को करने का எT8ர है । समर्पण में नहीं होती ತಾ कुचेष्टा होता है, वह ईश्वर के समक्ष ही होता है बुद्धि अर्पित करके होता है। ऐसा समर्पण जहाँ क्ोगाव वहाँ पर भीतरी आनंद और संतोषपूर्ण उल्लास कभी कमी नहीं आने मन अविचल பரரி भाव से ईश्वर के अंतर्नाद को सुनेगा तथा चेतना फिर कभी विभ्रमित नहीं होे सकेगी इसे ही समर्पण कहते हैं पूजा- उपचार वाला समर्पण नहीं, येन-केन प्रकारेण ईश्वर के समक्ष माथा टेक देने वाला नहीं , तथा उसे अपने व्यवहार में न उतार मात्र बाह्य गतिविधियों तक सीमित ईश्वर मिलता है हृदय की तीव्र रखने वाला नहीं उत्कंठा द्वारा, उसे प्रत्येक कार्य का आधार बनाकर जीवन जीने से। - ShareChat