#पौराणिक कथा
💥 तपोवन का तेज: ऋषि जमदग्नि और रेणुका! 💥
प्राचीन भारतवर्ष के घने वनों में, जहाँ शांति और पवित्रता का वास था, वहीं महर्षि जमदग्नि का आश्रम स्थित था। महर्षि जमदग्नि, जो सप्तऋषियों में से एक थे, अपनी कठोर तपस्या और क्रोध पर नियंत्रण (प्रायः) रखने के लिए जाने जाते थे। उनकी अर्धांगिनी थीं—माता रेणुका। रेणुका एक क्षत्रिय राजकुमारी थीं, लेकिन विवाह के पश्चात उन्होंने राजमहल के सुख-त्याग कर आश्रम के कठोर जीवन को पूर्ण समर्पण के साथ अपना लिया था।
उनके पाँच पुत्र थे, जिनमें सबसे छोटे थे राम (जो बाद में परशुराम कहलाए)। परशुराम बचपन से ही शस्त्र और शास्त्र दोनों में निपुण थे और अपने माता-पिता के प्रति उनकी भक्ति अतुलनीय थी।
नदी तट पर: मन का एक क्षणिक भटकाव
प्रतिदिन की भाँति, माता रेणुका प्रातःकाल नदी से जल भरने गईं। यह कोई साधारण जल-पात्र नहीं था; कहा जाता है कि माता रेणुका अपने सतीत्व और पवित्रता के बल पर गीली रेत से ही घड़ा बना लेती थीं और उसी में जल भरकर लाती थीं।
उस दिन, जब वे नदी तट पर पहुँचीं, तो उन्होंने देखा कि गंधर्वराज चित्ररथ अपनी पत्नियों (अप्सराओं) के साथ जल-क्रीड़ा कर रहे थे। उनका सौंदर्य और विलास देख, क्षणभर के लिए रेणुका का मन विचलित हो गया। वह आश्रम जीवन की कठोरता भूलकर उस दृश्य में खो गईं।
यह विचलन मात्र कुछ पलों का था, उन्हें तुरंत अपनी भूल का अहसास हुआ और वे संभल गईं। लेकिन, मन की एकाग्रता भंग होने के कारण उस दिन रेत का घड़ा नहीं बन पाया। भयभीत और लज्जित रेणुका किसी तरह जल लेकर आश्रम लौटीं, लेकिन उन्हें विलंब हो चुका था।
ऋषि का कोप: अग्नि परीक्षा
आश्रम में ऋषि जमदग्नि हवन के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे। जब रेणुका विलंब से और घबराई हुई लौटीं, तो ऋषि ने अपनी योग-दृष्टि से सब कुछ जान लिया। उन्होंने देख लिया कि उनकी पत्नी का मन क्षणभर के लिए धर्म से विमुख हुआ था।
ऋषि का क्रोध प्रलय की अग्नि के समान धधक उठा। उन्होंने अपनी भावनाओं पर नियंत्रण खो दिया और जोर से गर्जना की। उन्होंने अपने चार बड़े पुत्रों को बुलाया— रुक्मवान, सुषेण, वसु और विश्वावसु।
क्रोध से कांपते हुए ऋषि ने आदेश दिया:
> "पुत्रों! अपनी माता का वध कर दो! इनका मन कलुषित हो गया है।"
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चारों पुत्र यह सुनकर सन्न रह गए। अपनी ही जन्मदात्री माँ का वध? यह तो महापाप है! स्नेह और धर्म के द्वंद्व में फंसकर वे जड़वत हो गए और उन्होंने पिता का आदेश मानने से इनकार कर दिया। अपनी आज्ञा की अवहेलना देख ऋषि ने उन्हें श्राप दिया, जिससे वे अपनी चेतना खो बैठे और जड़वत हो गए।
परशुराम की प्रतिज्ञा: कर्तव्य की पराकाष्ठा
अंत में, ऋषि ने अपने सबसे छोटे और प्रिय पुत्र, परशुराम की ओर देखा।
ऋषि ने कहा, "राम! मेरी आज्ञा का पालन करो। अपनी माता और इन अवज्ञाकारी भाइयों का वध कर दो।"
परशुराम स्थिति की गंभीरता को समझ गए। वे जानते थे कि उनके पिता एक महान तपस्वी हैं। यदि उन्होंने आज्ञा नहीं मानी, तो पिता के श्राप से पूरा कुल नष्ट हो जाएगा। और यदि वे आज्ञा मान लेते हैं, तो पिता का क्रोध शांत हो जाएगा और प्रसन्न होकर वे वरदान देंगे।
परशुराम ने एक क्षण भी नहीं गंवाया। उन्होंने अपना तेजस्वी परशु (कुल्हाड़ी) उठाया और एक ही वार में अपनी माता और चारों भाइयों का सिर धड़ से अलग कर दिया।
वरदान और पुनर्जीवन: बुद्धि की विजय
जैसे ही यह कार्य पूर्ण हुआ, ऋषि जमदग्नि का क्रोध कपूर की तरह उड़ गया। उन्होंने देखा कि उनके पुत्र ने अपनी भावनाओं को मारकर 'पितृ-आज्ञा' (पिता के आदेश) को सर्वोपरि रखा।
प्रसन्न होकर ऋषि बोले:
> "वत्स! मैं तुम्हारी पितृ-भक्ति और साहस से अत्यंत प्रसन्न हूँ। आज तक किसी पुत्र ने ऐसी निष्ठा नहीं दिखाई। मांगो, क्या वरदान मांगते हो?"
>
परशुराम इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने हाथ जोड़कर, विनम्रतापूर्वक कहा:
"पिताश्री, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे ये वरदान दीजिए—
* मेरी माता और मेरे चारों भाई पुनः जीवित हो उठें।
* उन्हें इस बात की तनिक भी स्मृति न रहे कि मैंने उनका वध किया था।
* मेरा कोई भी पाप मुझे स्पर्श न कर सके और मैं युद्ध में सदैव अजेय रहूँ।"
ऋषि जमदग्नि मुस्कुराए। वे समझ गए कि उनके पुत्र ने न केवल आज्ञा का पालन किया, बल्कि अपनी बुद्धिमत्ता से सब कुछ पहले जैसा कर दिया। उन्होंने कहा, "तथास्तु!"
क्षणभर में, माता रेणुका और चारों भाई गहरी नींद से जागने की भांति उठ खड़े हुए। उन्हें लगा कि वे बस सो रहे थे। आश्रम का वातावरण पुनः पवित्र और शांत हो गया।
यह कथा हमें सिखाती है कि 'धर्म' की परिभाषा अत्यंत सूक्ष्म होती है। परशुराम जी ने दिखाया कि माता-पिता के प्रति विश्वास और आज्ञापालन से असंभव को भी संभव किया जा सकता है। उन्होंने 'हत्या' का पाप नहीं किया, बल्कि पिता की तपस्या पर भरोसा रखकर अपने परिवार को श्राप से मुक्त कराया।


