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यमुना की लहरों पर ज #जय श्री कृष्ण ब थिरके नंदनंदन: कालिया मर्दन की अनसुनी और विस्तृत कथा .... वृंदावन की गलियों में आज भी उस रोमांच की गूंज सुनाई देती है, जब एक छोटे से बालक ने यमुना के विशालकाय कालिया नाग का घमंड चूर कर दिया था। आइए जानते हैं इस अद्भुत लीला के हर एक पहलू को विस्तार से... कालिया नाग आखिर यमुना में क्यों आया !! शायद आप नहीं जानते होंगे, लेकिन कालिया नाग का असली घर रमणक द्वीप था। वहाँ गरुड़ देव का खौफ था। कालिया ने गरुड़ से बचने के लिए यमुना के इस कुंड को चुना, क्योंकि ऋषि सौभरि के एक श्राप के कारण गरुड़ यमुना के इस विशेष क्षेत्र में नहीं आ सकते थे। यानी कालिया ने अपनी जान बचाने के लिए यमुना को ही अपना बंधक बना लिया था! वो गेंद और कान्हा की ही लीला....' भगवान तो अंतर्यामी हैं, उन्हें यमुना को शुद्ध करना था। खेल-खेल में जब गेंद यमुना में गिरी, तो ग्वाल-बाल रोने लगे। श्रीदामा ने कहा, "कन्हैया, तू ही गया था गेंद लाने, अब तू ही लेकर आ!" और बस... कान्हा ने कदम्ब के पेड़ से सीधे विषैली लहरों में छलांग लगा दी। जल के भीतर का महायुद्ध.... यमुना के भीतर सन्नाटा छा गया। कालिया ने देखा कि एक सुंदर, पीताम्बर धारी बालक निर्भय होकर तैर रहा है। कालिया ने क्रोध में आकर कृष्ण को अपनी कुंडली में कस लिया। ब्रज में हाहाकार: ऊपर किनारे पर मैया यशोदा बेहोश हो गईं, नंद बाबा और सभी गोप-ग्वाले यमुना में कूदने को तैयार थे। गायें भी रोने लगीं। प्रभु का खेल: जब श्रीकृष्ण ने देखा कि उनके भक्त बहुत व्याकुल हो रहे हैं, तो उन्होंने अपना शरीर इतना विशाल करना शुरू किया कि कालिया की पकड़ ढीली होने लगी और वह हांफने लगा। 👣 फनों पर दिव्य नृत्य... कालिया के १०१ फन थे। भगवान उसके सिर पर उछलकर चढ़ गए। गन्धर्वों ने मृदंग बजाना शुरू किया, देवताओं ने फूल बरसाए। कृष्ण ने कालिया के हर उस फन को अपने चरणों से कुचल दिया जो अहंकार में ऊपर उठता था। जब कालिया के मुख से रक्त निकलने लगा और उसका विष समाप्त हो गया, तब उसे अहसास हुआ कि यह कोई साधारण बालक नहीं, स्वयं ब्रह्मांड के स्वामी हैं। नाग-पत्नियों की स्तुति..... कालिया की पत्नियां बाहर आईं। उन्होंने भगवान की बहुत सुंदर 'स्तुति' की। उन्होंने कहा— "प्रभु! दंड देना भी आपकी कृपा है। आपने इसके सिर पर पैर रखकर इसका उद्धार कर दिया। अब इसके प्राण बख्श दें।" यमुना का पुनर्जन्म और आशीर्वाद... भगवान ने कालिया को मुक्त किया और उसके मस्तक पर अपने 'चरण चिह्न' अंकित कर दिए। उन्होंने कहा, "अब गरुड़ तुम्हें हानि नहीं पहुँचाएगा क्योंकि तुम्हारे सिर पर मेरे पैरों के निशान हैं।" कालिया सपरिवार रमणक द्वीप चला गया और यमुना का जल फिर से कांच की तरह साफ और मीठा हो गया। इस लीला से हमें क्या सिख मिलती है... अहंकार का अंत: कालिया का विष उसका 'अहंकार' था। जब तक अहंकार रहता है, हम दूसरों को दुखी करते हैं। भगवान जब जीवन में आते हैं, तो सबसे पहले अहंकार का जहर ही निकालते हैं। पर्यावरण का संदेश: श्रीकृष्ण ने सदियों पहले सिखाया था कि जल स्रोतों को प्रदूषित होने से बचाना कितना जरूरी है। शरण में अभय: जो भगवान की शरण में आ जाता है (जैसे कालिया अंत में आया), उसे फिर किसी गरुड़ (मृत्यु या शत्रु) का डर नहीं रहता। जय श्रीकृष्ण.... .
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