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।। ॐ ।। कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति। अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि।। महाबाहु श्रीकृष्ण! भगवत्प्राप्ति के मार्ग से विचलित हुआ वह मोहित पुरुष छिन्न-भिन्न बादल की भाँति दोनों ओर से नष्ट-भ्रष्ट तो नहीं हो जाता? छोटी-सी बदली आकाश में छाये, तो वह न बरस पाती है न लौटकर मेघों से ही मिल पाती है; बल्कि हवा के झोंकों से देखते-देखते नष्टप्राय हो जाती है। इसी प्रकार शिथिल प्रयत्नवाला, कुछ काल तक साधन करके स्थगित करनेवाला नष्ट तो नहीं हो जाता? वह न आपमें प्रवेश कर सका और न भोग ही भोग पाया। उसकी कौन-सी गति होती है? #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - LAVuwu-{1 4al ٦٠ ٧ ٥٥٧ পককমম গযমসিনযন যযচন সুযে ঢির শিচা কৎল -17 O/ u l4r On !uಗ ப7 Lnmil' Ammn ll LAVuwu-{1 4al ٦٠ ٧ ٥٥٧ পককমম গযমসিনযন যযচন সুযে ঢির শিচা কৎল -17 O/ u l4r On !uಗ ப7 Lnmil' Ammn ll - ShareChat