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#राधे कृष्ण खेलत दोऊ कुंजन होरी। मूठ गुलाल उडावत सजनी,ढोरत रंग कमोरी। बाजत चंग मृदंग सारंगी,गावत हैं मिल गौरी॥ पिचकारी बोछारन बरसत,फेंकत बूकन झोरी। रामसखी मेरे नैनन बसोरी,नवल किशोर की जोरी॥ चिरजीवो मेरे दोउ कुंजबिहारी॥ नित्य केलि वृन्दावन वीथिन,करियें बलि लालन अरु प्यारी। नित्य सुहाग भाग आलिन को,तुम सुख सुखी रहत सब नारी॥ नित्य खेल होरी हिंडोल को,नित विहार सुखकारी। नित्य रहै आनंद घन वर्षा,रामसखी मनुहारी॥ होरी खेलनि स्याम हुलसि छबीली आई। अबीर गुलाल लिएँ नैननि में, आजु करत मन भाई॥ बाजे बजत दुहुँ दिसि नीके, मनमथ मोद बढ़ाई। छबि तरंग छूटत पिचकारी, भृकुटिन मार मचाई॥ गावत गीत रस-रीति जीति के, पुलकि किलकि सुखदाई। श्रीरसिकबिहारिनि की छवि निरखत, ज्यों दामिनि घन छाई॥
राधे कृष्ण - ShareChat