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गज़ल #✒ शायरी
✒ शायरी - एहतिजाज करे भी तो क्या मिले क़तरा अब दरिया जो लग रहे थे समंदर से जा मिले गज़़ल भीड़ दौड़ता है यहां की तरफ हर शख़्स फिर यह भी चाहता है उसे रास्ता मिले इस आरज़ू ने और तमाशा बना दिया जो भी मिले है हमारी तरफ़ देखता मिले की नज़र से न देखिये दुनिया को दूसरों चेहरे न पढ सके तो किताबों में क्या मिले रिश्तों को बार बार समझने की आरज़ू कहती है फिर मिले तो कोई बेवफ़ा मिले। दौर-ए-मुंसिफ़ी में ज़रूरी नहीं ' वसीम' इस जिस शख़्स की ख़ता हो उसी को सज़ा मिले बरेलवीotivational Vicleos Aoo वस एहतिजाज करे भी तो क्या मिले क़तरा अब दरिया जो लग रहे थे समंदर से जा मिले गज़़ल भीड़ दौड़ता है यहां की तरफ हर शख़्स फिर यह भी चाहता है उसे रास्ता मिले इस आरज़ू ने और तमाशा बना दिया जो भी मिले है हमारी तरफ़ देखता मिले की नज़र से न देखिये दुनिया को दूसरों चेहरे न पढ सके तो किताबों में क्या मिले रिश्तों को बार बार समझने की आरज़ू कहती है फिर मिले तो कोई बेवफ़ा मिले। दौर-ए-मुंसिफ़ी में ज़रूरी नहीं ' वसीम' इस जिस शख़्स की ख़ता हो उसी को सज़ा मिले बरेलवीotivational Vicleos Aoo वस - ShareChat