#bhakti #29 January #2026 #jay shree ram #shree ram “जब दशरथ ने आख़िरी बार ‘राम’ कहा — और तीनों रानियाँ चीख भी न पाईं…”
अयोध्या में उस रात एक भी दीपक नहीं जला।
सिर्फ एक बूढ़ा पिता—
जो अपने ही बनाए अंधकार में मर रहा था।
राम चले गए थे।
और दशरथ, टूटते हुए स्वर में बार-बार कह रहे थे—
“मैंने उसे पाया… पर मैं उसे रख न सका…”
तीनों रानियाँ जड़ थीं।
जिस पुत्र को मांगने के लिए
वे रातों तक रोई थीं…
आज उसी पुत्र के वियोग में
उनके पति की साँसें टूट रही थीं।
दशरथ की आँखें भर आईं—
अपराधबोध की आग उन्हें भीतर से जला रही थी।
श्रवण-कुमार का पाप…
एक पिता की हृदय-भंगिमा…
और उसी क्षण—
उन्होंने अंतिम बार कहा:
“राम…”
फिर…
“राम…”
और तीसरी सांस के साथ—
शरीर शांत।
🌸 रामचरितमानस — अयोध्याकाण्ड
“राम राम कही राम कही राम राम कही राम ।
तनु परिहरि रघुबीर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम ॥”
एक राजा नहीं मरा।
एक पिता मर गया—
क्योंकि वह अपने बच्चे का विरह सह नहीं पाया।
💔 अब यह प्रश्न सीधे आपके दिल पर:
दशरथ और रानियाँ—
उन्होंने राम को पाया भी था
और खो भी दिया।
किसके कारण?
राक्षसों के नहीं…
समय के नहीं…
भाग्य के नहीं…
बल्कि “मोह” और “संसारिक बंधनों” के कारण।
अब अपने भीतर देखिए—
क्या आप भी वही कर रहे हैं?
क्या आप भी अपने जीवन के
किसी “राम-समान” व्यक्ति को
अपेक्षाओं, नियंत्रण, अहंकार, नाराजगी, या मौन
के कारण खो रहे हैं?
रिश्ता टूटता नहीं—
मोह धीरे-धीरे उसे खा जाता है।
आज ही किसी अपने को देखें…
और खुद से पूछें—
“कहीं मैं भी अपने राम को खोते-खोते…
दशरथ की तरह देर तो नहीं कर रहा हूँ?”
⭐ Rare Upaay
📘 स्रोत: वाल्मीकि रामायण — अयोध्याकाण्ड, अध्याय 29–30
गुरु वशिष्ठ ने राजा दशरथ के वियोग से व्याकुल मन को शांत करने के लिए
राम-नाम को ही एकमात्र मानसिक-शांति उपाय बताया।
👉 उसी सिद्धांत पर आधारित उपाय:
रात में, मन को स्थिर कर,
108 बार बहुत धीमे जप करें:
“ॐ रामाय नमः”
(Reference: Valmiki Ramayana, Ayodhya Kanda, 29.5 & 30.2)
अर्थ —
राम-नाम मन के दोषों, अपराधबोध, मोह और वियोग की आग को शांत करता है।
जहाँ राम-नाम होता है, वहाँ मन का अंधकार टिकता नहीं।
यह उपाय
न तिथि देखता है, न दिशा, न उपवास।
यह सिर्फ हृदय की सच्चाई देखता है।
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“यदि इस पोस्ट ने आपके किसी पुराने घाव को खोल दिया हो—तो उस क्षण को राम संभाल लें; मैं केवल दर्पण था।”


