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।। ॐ ।। स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते। लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हितान्॥ वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देव-विग्रह के पूजन में तत्पर होता है और देवता के माध्यम से मेरे ही द्वारा निर्मित उन इच्छित भोगों को निःसन्देह प्राप्त होता है। भोग कौन देता है? मैं ही देता हूँ। उसकी श्रद्धा का परिणाम है भोग, न कि किसी देवता की देन। किन्तु वह फल तो पा ही लेता है फिर इसमें बुराई क्या है? इस पर कहते हैं- #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख
यथार्थ गीता - ಣilaf inibili ಖtiumlmmiitl श्री फलहस स्वामी परमानन्वना लहारजा 132 युक्तस्तस्याराधनमीहते। nಖTe  विहितान्हितान्।। चततकामान्मयैच बह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देव विग्रह के पूजन में तत्पर होता है और देवता के माष्रनम से मेरे ही द्वारा निर्मित उन ईच्छित भोयको निःसन्देह प्राप्त होता है। है? मैं ही देता हूँ। उसकी भोग कौन श्रद्धा का " रिणाम है भोग न किकिसी किन्तु वह फल तो पा ही देवता लेता हैफिइसमें बुराईक्या है? इस पर कहते हैं ಣilaf inibili ಖtiumlmmiitl श्री फलहस स्वामी परमानन्वना लहारजा 132 युक्तस्तस्याराधनमीहते। nಖTe  विहितान्हितान्।। चततकामान्मयैच बह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देव विग्रह के पूजन में तत्पर होता है और देवता के माष्रनम से मेरे ही द्वारा निर्मित उन ईच्छित भोयको निःसन्देह प्राप्त होता है। है? मैं ही देता हूँ। उसकी भोग कौन श्रद्धा का " रिणाम है भोग न किकिसी किन्तु वह फल तो पा ही देवता लेता हैफिइसमें बुराईक्या है? इस पर कहते हैं - ShareChat