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#सब्ज़परी उतरी आँगन में
सब्ज़परी उतरी आँगन में - सब्ज़परी उतरी आँगन में फूटी गन्ध सुमन बन | अनजानी डाली पर कुहके मेरा बनजारा मन | विकल समीर फिरे वननवन कुण्डल में कस्तूरी भर कम्पित कलियों के अधरों पर बिछे मदिर श्रमनसीकर | ऐसी आँधी उठी वसन्ती लिपटी दिशा गगन से वल्लरियाँ द्रुम से आलिंगित स्वप्निल प्रीति सृजन से। किन नयनों ने क्या कर डाला सुलगा तरु का यौवन बिछुड़ रहा है वृन्त वृन्त से मेरा अलसाया तन | रंगिनी बाँट गई उषा प्राची नभ से कुंकुम जो मानसन्मानस सिमटे वे उपजे अनुराग कुसुम हो। अनहोनी कुछ हुई न फिर क्यों भाव जगे सिहरन के? னப ாP  सब्ज़परी उतरी आँगन में फूटी गन्ध सुमन बन | अनजानी डाली पर कुहके मेरा बनजारा मन | विकल समीर फिरे वननवन कुण्डल में कस्तूरी भर कम्पित कलियों के अधरों पर बिछे मदिर श्रमनसीकर | ऐसी आँधी उठी वसन्ती लिपटी दिशा गगन से वल्लरियाँ द्रुम से आलिंगित स्वप्निल प्रीति सृजन से। किन नयनों ने क्या कर डाला सुलगा तरु का यौवन बिछुड़ रहा है वृन्त वृन्त से मेरा अलसाया तन | रंगिनी बाँट गई उषा प्राची नभ से कुंकुम जो मानसन्मानस सिमटे वे उपजे अनुराग कुसुम हो। अनहोनी कुछ हुई न फिर क्यों भाव जगे सिहरन के? னப ாP - ShareChat