#☝आज का ज्ञान
🌊 क्षीरसागर — जब सृष्टि ने संतुलन माँगा 🌊
जब न धरती थी, न आकाश की पहचान,
चारों ओर बस एक अनंत, श्वेत, शांत जलराशि थी— वही था क्षीरसागर।
उस असीम सागर की गोद में अनंत शेषनाग अपनी विराट कुंडलियों पर सम्पूर्ण ब्रह्मांड को थामे हुए थे।
उन पर विराजमान थे भगवान विष्णु— योगनिद्रा में लीन, पर पूर्ण जागरूक… शांत, तेजस्वी, करुणामय।
उनकी नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ, और उस कमल पर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी प्रकट हुए— सृष्टि रचने के लिए तत्पर।
पर तभी… अधर्म की छाया बढ़ने लगी। असुरों का अत्याचार बढ़ा, पृथ्वी पर संतुलन डगमगाने लगा।
देवताओं के हृदय में भय और आशा, दोनों एक साथ जाग उठे।
सबने एक स्वर में पुकारा—
“हे पालनहार! सृष्टि असंतुलित हो रही है, हमें आपकी शरण चाहिए।”
देवता क्षीरसागर पहुँचे…
वहाँ शांत लहरों के बीच भगवान विष्णु योगनिद्रा में विराजमान थे।
उनकी स्तुति होते ही उनके नेत्र खुले… और जैसे ही नेत्र खुले, अंधकार पर प्रकाश छा गया।
शेषनाग के फन दमक उठे, समुद्र की लहरें थम सी गईं, मानो पूरी सृष्टि उनकी वाणी सुनने को ठहर गई हो।
भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले—
“जब-जब धर्म डगमगाता है, अधर्म बढ़ता है,
तब-तब मैं स्वयं अवतार लेकर संतुलन स्थापित करता हूँ।”
यह वचन सुनते ही देवताओं के भय की जगह विश्वास ने ले ली।
वे नतमस्तक हुए… और लौट गए, क्योंकि अब उन्हें पता था—
सृष्टि का संतुलन सुरक्षित है।
भगवान विष्णु पुनः योगनिद्रा में लीन हो गए,
पर यह निद्रा मौन नहीं थी… यह सतत जागरूकता थी,
जो हर युग, हर संकट, हर असंतुलन पर नजर रखती है।
और शेषनाग की शांत मुद्रा जैसे कह रही थी—
“धैर्य रखो… संतुलन कभी टूटता नहीं, बस समय लेता है।”
🌼 आज की सीख
ईश्वर कभी निष्क्रिय नहीं होते,
वे मौन रहकर भी हर क्षण सृष्टि का संतुलन संभाल रहे होते हैं।
जब अधर्म बढ़ता है, समाधान भी जन्म ले चुका होता है।
धैर्य रखो… धर्म की विजय तय है। 🙏✨


