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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-2️⃣9️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) षण्णवतितमोऽध्यायः महाभिष को ब्रह्माजी का शाप तथा शापग्रस्त वसुओं के साथ गंगा की बातचीत...(दिन 298) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ न निवर्तयितुं शक्यं यदुक्तं ब्रह्मवादिना । त्वमस्मान् मानुषी भूत्वा सृज पुत्रान्-वसून् भुवि ।। १५ ।। 'उन ब्रह्मवादी महर्षिने जो बात कह दी है, वह टाली नहीं जा सकती; अतः हमारी प्रार्थना है कि तुम पृथ्वीपर मानवपत्नी होकर हम वसुओंको अपने पुत्ररूपसे उत्पन्न करो ।। १५ ।। न मानुषीणां जठरं प्रविशेम वयं शुभे । इत्युक्ता तैश्च वसुभिस्तथेत्युक्त्वाब्रवीदिदम् ।। १६ ।। 'शुभे! हमें मानुषी स्त्रियोंके उदरमें प्रवेश न करना पड़े, इसीलिये हमने यह अनुरोध किया है।' वसुओंके ऐसा कहनेपर गंगाजी 'तथास्तु' कहकर यों बोलीं ।। १६ ।। गङ्गोवाच मत्र्येषु पुरुषश्रेष्ठः को वः कर्ता भविष्यति। होंगे। गंगाजीने कहा-वसुओ ! मर्त्यलोकमें ऐसे श्रेष्ठ पुरुष कौन हैं; जो तुमलोगों के पिता वसव ऊचुः प्रतीपस्य सुतो राजा शान्तनुर्लोकविश्रुतः । भविता मानुषे लोके स नः कर्ता भविष्यति ।। १७ ।। वसुगण बोले-प्रतीपके पुत्र राजा शान्तनु लोकविख्यात साधु पुरुष होंगे। मनुष्यलोकमें वे ही मारे जनक होंगे ।। १७ ।। गङ्गोवाच ममाप्येवं मतं देवा यथा मां वदतानघाः । प्रियं तस्य करिष्यामि युष्माकं चैतदीप्सितम् ।। १८ ।। गंगाजीने कहा-निष्पाप देवताओ! तुमलोग जैसा कहते हो, वैसा ही मेरा भी विचार है। मैं राजा शान्तनुका प्रिय करूँगी और तुम्हारे इस अभीष्ट कार्यको भी सिद्ध करूँगी ।। १८ ।। वसव ऊचुः जातान् कुमारान् स्वानप्सु प्रक्षेप्तुं वै त्वमर्हसि । यथा न चिरकालं नो निष्कृतिः स्यात् त्रिलोकगे ।। १९ ।। वसुगण बोले-तीनों लोकोंमें प्रवाहित होनेवाली गंगे ! हमलोग जब तुम्हारे गर्भसे जन्म लें, तब तुम पैदा होते ही हमें अपने जलमें फेंक देना; जिससे शीघ्र ही हमारा मर्त्यलोकसे छुटकारा हो जाय ।। १९ ।। गङ्गोवाच एवमेतत् करिष्यामि पुत्रस्तस्य विधीयताम् । नास्य मोघः संगमः स्यात् पुत्रहेतोर्मया सह ।। २० ।। गंगाजीने कहा- ठीक है, मैं ऐसा ही करूँगी; परंतु उस राजाका मेरे साथ पुत्रके लिये किया हुआ सम्बन्ध व्यर्थ न हो जाय, इसलिये उनके लिये एक पुत्रकी भी व्यवस्था होनी चाहिये ।। २० ।। वसव ऊचुः तुरीयार्धं प्रदास्यामो वीर्यस्यैकैकशो वयम् । तेन वीर्येण पुत्रस्ते भविता तस्य चेप्सितः ।। २१ ।। वसुगण बोले- हम सब लोग अपने तेजका एक-एक अष्टमांश देंगे। उस तेजसे जो तुम्हारा एक पुत्र होगा, वह उस राजाकी इच्छाके अनुरूप होगा ।। २१ ।। न सम्पत्स्यति मत्र्येषु पुनस्तस्य तु संततिः। तस्मादपुत्रः पुत्रस्ते भविष्यति स वीर्यवान् ।। २२ ।। किंतु मर्त्यलोकमें उसकी कोई संतान न होगी। अतः तुम्हारा वह पुत्र संतानहीन होने के साथ ही अत्यन्त पराक्रमी होगा ।। २२ ।। एवं ते समयं कृत्वा गङ्गया वसवः सह । जग्मुः संहृष्टमनसो यथासंकल्पमञ्जसा ।। २३ ।। इस प्रकार गंगाजीके साथ शर्त करके वसुगण प्रसन्नतापूर्वक अपनी इच्छाके अनुसार चले गये ।। २३ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि महाभिषोपाख्याने षण्णवतितमोऽध्यायः ।। ९६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें महाभिषोपाख्यानविषयक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९६ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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