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#Eek Tu Hi Guru Ji
Eek Tu Hi Guru Ji - @ೂ पुत्तर मनुष्य ने जब अपने ढंग से जीना शुरू किया तो इसका अर्थ यही है कि उसने कुदरत की लय को छोड़कर अपनी एक कृत्रिम लय बना ली है।वे भूल गए हैं कि वह सभी सरमंदर की एक लहर की तरह हैंl Tu लहर खुद को समंदर से अलग मानकर अकड़ तो सकती है॰ पर उसका अस्तित्व समंदर के बिना संभव नहीं है। इंसान को लगा कि वह प्रकृति Hi का 'मालिक है, जबकि वह उसका केवल एक 'हिस्सा है। यहां मनुष्य का ज्यादा समझदार होने उसका सबसे बड़ा भ्रम थाः॰!! जिब वह Tu बाहरी प्रकृति से कटते हैं॰ तो उसके भीतर की प्रकृति भी अशांत हो जाती है।उसकी शांति का केवल एक ही उपाय है..वापसी .?? यह Gu वापसी कहीं बाहर जाने कीःनहीं, बल्कि उसके अपने भीतर के उस संतुलन को फिर से खोजने की है।जब वह यह स्वीकार कर लेते हैं कि वह इस विशाल ब्रह्मांड का एक छोटे सा अभिन्न अंग हैं॰ तब उसके Ji भीतर की मैं Cc०) शांत होने लगती है। समर्पण ही वह बिंदु है जहाँ से वास्तविक समझदारी शुरू होती है॰॰!! ऊँ नमःशिवाय शिवा शिव जी सदा सहाय।। @ೂ पुत्तर मनुष्य ने जब अपने ढंग से जीना शुरू किया तो इसका अर्थ यही है कि उसने कुदरत की लय को छोड़कर अपनी एक कृत्रिम लय बना ली है।वे भूल गए हैं कि वह सभी सरमंदर की एक लहर की तरह हैंl Tu लहर खुद को समंदर से अलग मानकर अकड़ तो सकती है॰ पर उसका अस्तित्व समंदर के बिना संभव नहीं है। इंसान को लगा कि वह प्रकृति Hi का 'मालिक है, जबकि वह उसका केवल एक 'हिस्सा है। यहां मनुष्य का ज्यादा समझदार होने उसका सबसे बड़ा भ्रम थाः॰!! जिब वह Tu बाहरी प्रकृति से कटते हैं॰ तो उसके भीतर की प्रकृति भी अशांत हो जाती है।उसकी शांति का केवल एक ही उपाय है..वापसी .?? यह Gu वापसी कहीं बाहर जाने कीःनहीं, बल्कि उसके अपने भीतर के उस संतुलन को फिर से खोजने की है।जब वह यह स्वीकार कर लेते हैं कि वह इस विशाल ब्रह्मांड का एक छोटे सा अभिन्न अंग हैं॰ तब उसके Ji भीतर की मैं Cc०) शांत होने लगती है। समर्पण ही वह बिंदु है जहाँ से वास्तविक समझदारी शुरू होती है॰॰!! ऊँ नमःशिवाय शिवा शिव जी सदा सहाय।। - ShareChat