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।। ॐ ।। अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥ "मेरे अतिरिक्त और कोई चित्त में है ही नहीं।"-अन्य किसी का चिन्तन न करता हुआ अर्थात् अनन्य चित्त से स्थिर हुआ जो अनवरत मेरा स्मरण करता है, उस नित्य मुझमें युक्त योगी के लिये मैं सुलभ हूँ। आपके सुलभ होने से क्या मिलेगा? देखें-"यथार्थ गीता" #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏
❤️जीवन की सीख - I|36 || अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः| तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ll  "मेरे अतिरिक्त और कोई चित्त में है ही नहीं। " -अन्य किसी का चिन्तन न करता हुआ अर्थात् अनन्य चित्त से स्थिर हुआ जो अनवरत मेरा स्मरण करता है, उस नित्य मुझमें युक्त योगी के लिये मैं सुलभ हूँ । आपके सुलभ होने से क्या मिलेगा ? देखें " यथार्थ गीता" I|36 || अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः| तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ll  "मेरे अतिरिक्त और कोई चित्त में है ही नहीं। " -अन्य किसी का चिन्तन न करता हुआ अर्थात् अनन्य चित्त से स्थिर हुआ जो अनवरत मेरा स्मरण करता है, उस नित्य मुझमें युक्त योगी के लिये मैं सुलभ हूँ । आपके सुलभ होने से क्या मिलेगा ? देखें " यथार्थ गीता" - ShareChat