ShareChat
click to see wallet page
search
#श्रीरामचरितमानस राजा दशरथ की आज्ञा से जब श्री राम को चौदह वर्षों का वनवास मिला, तब सीता ने राजमहल का सुख त्याग कर कहा, “जहाँ आप, वहीं मेरा संसार।” काँटों भरे पथ, घने वन और कठिनाइयाँ—सब सीता ने मुस्कान के साथ स्वीकार कीं, क्योंकि उनके लिए राम ही धर्म थे। वन में दोनों ने साधु-संतों की सेवा की, राक्षसों के अत्याचार से रक्षा की और प्रेम के साथ कर्तव्य निभाया। पंचवटी की शांत छाया में उनका प्रेम और भी पवित्र हुआ। पर विधि ने परीक्षा ली—रावण द्वारा सीता का हरण। यह केवल अपहरण नहीं, अधर्म की चुनौती थी। श्री राम ने धैर्य और साहस से वानर सेना संगठित की, समुद्र पर सेतु बाँधा और लंका में अधर्म का अंत किया। युद्ध के बाद सीता की पवित्रता सत्य की अग्नि-सी उज्ज्वल हुई, और धर्म की विजय हुई। अंततः अयोध्या लौटकर राम-सीता का राज्याभिषेक हुआ। रामराज्य में न्याय, करुणा और समता का प्रकाश फैला। यह कथा सिखाती है कि सच्चा प्रेम त्याग माँगता है, धर्म साहस देता है और सत्य अंततः विजयी होता है।
श्रीरामचरितमानस - ShareChat