#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣9️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
द्वयधिकशततमोऽध्यायः
भीष्म के द्वारा स्वयंवर से काशिराज की कन्याओं का हरण, युद्ध में सब राजाओं तथा शाल्व की पराजय, अम्बिका और अम्बालिका के साथ विचित्रवीर्य का विवाह तथा निधन...(दिन 319)
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ततो भीष्मं शान्तनवं शरैः शतसहस्रशः । शाल्वराजो नरश्रेष्ठः समवाकिरदाशुगैः ।। ४२ ।।
तदनन्तर मनुष्योंमें श्रेष्ठ राजा शाल्व शान्तनुनन्दन भीष्मपर सैकड़ों और हजारों शीघ्रगामी बाणोंकी बौछार करने लगा ।। ४२ ।।
पूर्वमभ्यर्दितं दृष्ट्वा भीष्मं शाल्वेन ते नृपाः ।
विस्मिताः समपद्यन्त साधु साध्विति चाब्रुवन् ।। ४३ ।।
शाल्वने पहले ही भीष्मको पीड़ित कर दिया। यह देखकर सभी राजा आश्चर्यचकित हो गये और 'वाह-वाह' करने लगे ।। ४३ ।।
लाघवं तस्य ते दृष्ट्वा समरे सर्वपार्थिवाः । अपूजयन्त संहृष्टा वाग्भिः शाल्वं नराधिपम् ।। ४४ ।।
युद्धमें उसकी फुर्ती देख सब राजा बड़े प्रसन्न हुए और अपनी वाणीद्वारा शाल्वनरेशकी प्रशंसा करने लगे ।। ४४ ।।
क्षत्रियाणां ततो वाचः श्रुत्वा परपुरंजयः । क्रुद्धः शान्तनवो भीष्मस्तिष्ठ तिष्ठेत्यभाषत ।। ४५ ।।
शत्रुओंकी राजधानीको जीतनेवाले शान्तनुनन्दन भीष्मने क्षत्रियोंकी वे बातें सुनकर कुपित हो शाल्वसे कहा- 'खड़ा रह, खड़ा रह' ।। ४५ ।।
सारथिं चाब्रवीत् क्रुद्धो याहि यत्रैष पार्थिवः ।
यावदेनं निहन्म्यद्य भुजङ्गमिव पक्षिराट् ।। ४६ ।।
फिर सारथिसे कहा- 'जहाँ यह राजा शाल्व है, उधर ही रथ ले चलो। जैसे पक्षिराज गरुड सर्पको दबोच लेते हैं, उसी प्रकार मैं इसे अभी मार डालता हूँ' ।। ४६ ।।
ततोऽस्त्रं वारुणं सम्यग योजयामास कौरवः । तेनाश्वांश्चतुरोऽमृद्माच्छाल्वराजस्य भूपते ।। ४७ ।।
जनमेजय! तदनन्तर कुरुनन्दन भीष्मने धनुषपर उचित रीतिसे वारुणास्त्रका संधान किया और उसके द्वारा शाल्वराजके चारों घोड़ोंको रौंद डाला ।। ४७ ।।
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य शाल्वराजस्य कौरवः ।
भीष्मो नृपतिशार्दूल न्यवधीत् तस्य सारथिम् ।। ४८ ।।
नृपश्रेष्ठ ! फिर अपने अस्त्रोंसे राजा शाल्वके अस्त्रोंका निवारण करके कुरुवंशी भीष्मने उसके सारथिको भी मार डाला ।। ४८ ।।
अस्त्रेण चास्याथैन्द्रेण न्यवधीत् तुरगोत्तमान् ।
कन्याहेतोर्नरश्रेष्ठ भीष्मः शान्तनवस्तदा ।। ४९ ।।
जित्वा विसर्जयामास जीवन्तं नृपसत्तमम् ।
ततः शाल्वः स्वनगरं प्रययौ भरतर्षभ ।। ५० ।।
स्वराज्यमन्वशाच्चैव धर्मेण नृपतिस्तदा ।
राजानो ये च तत्रासन् स्वयंवरदिदृक्षवः ।। ५१ ।।
स्वान्येव तेऽपि राष्ट्राणि जग्मुः परपुरंजयाः ।
एवं विजित्य ताः कन्या भीष्मः प्रहरतां वरः ।। ५२ ।।
प्रययौ हास्तिनपुरं यत्र राजा स कौरवः ।
विचित्रवीर्यो धर्मात्मा प्रशास्ति वसुधामिमाम् ।। ५३ ।।
तत्पश्चात् ऐन्द्रास्त्रद्वारा उसके उत्तम अश्वोंको यमलोक पहुँचा दिया। नरश्रेष्ठ ! उस समय शान्तनुनन्दन भीष्मने कन्याओंके लिये युद्ध करके शाल्वको जीत लिया और नृपश्रेष्ठ शाल्वका भी केवल प्राणमात्र छोड दिया। जनमेजय ! उस समय शाल्व अपनी राजधानीको लौट गया और धर्मपूर्वक राज्यका पालन करने लगा। इसी प्रकार शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले जो-जो राजा वहाँ स्वयंवर देखनेकी इच्छासे आये थे, वे भी अपने-अपने देशको चले गये। प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीष्म उन कन्याओंको जीतकर हस्तिनापुरको चल दिये; जहाँ रहकर धर्मात्मा कुरुवंशी राजा विचित्रवीर्य इस पृथ्वीका शासन करते थे ।। ४९-५३ ।।
यथा पितास्य कौख्यः शान्तनुर्नृपसत्तमः ।
सोऽचिरेणैव कालेन अत्यक्रामन्नराधिप ।। ५४ ।।
वनानि सरितश्चैव शैलांश्च विविधान् द्रुमान् ।
अक्षतः क्षपयित्वारीन् संख्येऽसंख्येयविक्रमः ।। ५५ ।।
उनके पिता कुरुश्रेष्ठ नृपशिरोमणि शान्तनु जिस प्रकार राज्य करते थे, वैसा ही वे भी करते थे। जनमेजय ! भीष्मजी थोड़े ही समयमें वन, नदी, पर्वतोंको लाँघते और नाना प्रकारके वृक्षोंको लाँघते और पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ गये। युद्धमें उनका पराक्रम अवर्णनीय था। उन्होंने स्वयं अक्षत रहकर शत्रुओंको ही क्षति पहुँचायी थी ।। ५४-५५ ।।
आनयामास काश्यस्य सुताः सागरगासुतः ।
स्नुषा इव स धर्मात्मा भगिनीरिव चानुजाः ।। ५६ ।।
यथा दुहितरश्चैव परिगृह्य ययौ कुरून् ।
आनिन्ये स महाबाहुर्भातुः प्रियचिकीर्षया ।। ५७ ।।
धर्मात्मा गंगानन्दन भीष्म काशिराजकी कन्याओंको पुत्रवधू, छोटी बहिन एवं पुत्रीकी भाँति साथ रखकर कुरुदेशमें ले आये। वे महाबाहु अपने भाई विचित्रवीर्यका प्रिय करनेकी इच्छासे उन सबको लाये थे ।। ५६-५७ ।।
ताः सर्वगुणसम्पन्ना भ्राता भ्रात्रे यवीयसे ।
भीष्मो विचित्रवीर्याय प्रददौ विक्रमाहृताः ।। ५८ ।।
भाई भीष्मने अपने पराक्रमद्वारा हरकर लायी हुई उन सर्वसद्गुणसम्पन्न कन्याओंको अपने छोटे भाई विचित्रवीर्यके हाथमें दे दिया ।। ५८ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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