#महाभारत
अश्वत्थामा की उत्पत्ति 👈
युद्ध से बहुत पहले, जब आचार्य द्रोण और माता कृपी हिमालय की शांति में तपस्या कर रहे थे, तब वे ऋषिकेश के समीप तमसा नदी के किनारे एक शांत, दिव्य गुफा में पहुँचे। वहाँ तपेश्वर महादेव का स्वयंभू शिवलिंग था, जिसके समक्ष उन्होंने संतान-प्राप्ति के लिए कठोर साधना की।
उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने आशीर्वाद दिया—और कुछ समय बाद कृपी ने तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। जन्म के क्षण ही उसके कंठ से अश्व की सी ध्वनि निकली, जिससे उसका नाम अश्वत्थामा पड़ा।
जन्म से ही उसके मस्तक में एक दिव्य मणि विद्यमान थी—
एक ऐसी शक्ति जो उसे भय, भूख, थकान और यहाँ तक कि मृत्यु के कई रूपों से भी सुरक्षित रखती थी। समय के साथ यह मणि उसके गर्व और असाधारण सामर्थ्य का प्रतीक बन गई।
लेकिन जब उसने धर्म-विरुद्ध कर्म किए, तो वही मणि उसका सबसे बड़ा बोझ बन गई—और अर्जुन द्वारा उसका हटाया जाना उसके अहंकार का अंत था, ना कि उसके अस्तित्व का।महाभारत के अंतिम चरणों में जब अश्वत्थामा ने अत्यन्त अन्यायपूर्ण कार्य किया, तब स्थिति अत्यन्त संवेदनशील हो गई। श्रीकृष्ण यह भली-भाँति समझते थे कि अर्जुन के सामने केवल युद्ध का प्रश्न नहीं था—यह धर्म, क्षमा और न्याय के संतुलन की कठिन परीक्षा थी। वे अर्जुन के मन की दृढ़ता को परखना चाहते थे, इसलिए उन्होंने कठोर वचन कहे, ताकि स्पष्ट हो सके कि अर्जुन परिस्थिति को कैसे समझता है।
परंतु अर्जुन का स्वभाव शांत और धैर्यपूर्ण था। वह जानता था कि शीघ्र क्रोध में लिया गया निर्णय कभी धर्म की रक्षा नहीं कर सकता। इसलिए उसने अश्वत्थामा को जीवित ही शिविर में ले जाकर द्रौपदी के सामने प्रस्तुत किया।
गुरुपुत्र को बँधा देखकर द्रौपदी का हृदय पिघल गया। उसके मन में द्वेष का स्थान कभी नहीं था। उसने अर्जुन से कहा—
“हे अर्जुन, ये गुरुपुत्र हैं, ब्राह्मण हैं, और ब्राह्मण का अनादर भी पाप माना गया है। आचार्य द्रोण से जो ज्ञान तुम्हें मिला, वही आज तुम्हारी पहचान है। यदि अश्वत्थामा का अंत कर दिया गया, तो उनकी माता कृपी उसी प्रकार शोक में टूट जाएँगी, जैसे मैं अपने पुत्रों के लिए टूटी हूँ। मेरे पुत्र तो लौट नहीं सकते, पर किसी और माँ का दुःख मैं क्यों बढ़ाऊँ? अतः इन्हें छोड़ दिया जाए।”
द्रौपदी के इन सहृदय शब्दों से पूरा सभागृह शांत हो गया, किन्तु भीम का क्रोध अभी भी शांत नहीं था। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया—
“धर्म सरल रेखा नहीं है, अर्जुन। पतित ब्राह्मण को दण्ड देना भी कठिन है और निर्दोषों पर अत्याचार करने वाले को छोड़ देना भी। तुम्हें वह मार्ग चुनना होगा जिसमें न्याय और दया दोनों का संतुलन हो।”
अर्जुन ने वही किया—उसने न तो अश्वत्थामा को पूरी छूट दी, न कठोर दण्ड। उसने प्रतीकात्मक रूप से उसका अभिमान और दैवी शक्ति दोनों छीन लीं, ताकि वह आगे कोई अन्याय न कर सके। उसके केश काटे गए और मस्तक में स्थित दिव्य मणि निकाल ली गई, जो उसे अदम्य शक्ति प्रदान करती थी।
उस शक्ति-विहीन अवस्था में वह न तो किसी को क्षति पहुँचा सकता था, न ही अपने अहंकार के बल पर कुछ कर सकता था। अर्जुन ने उसे शिविर से बाहर भेज दिया—दण्ड भी मिला, और अनावश्यक हिंसा से बचाव भी हुआ। यही धर्म का संतुलन था।
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