#श्री हरि विष्णु
🙏🥰 #भगवानविष्णु का विराट स्वरूप, जिसे विश्वरूप भी कहते हैं, उनका वह ब्रह्मांडीय और सार्वभौमिक रूप है जिसमें संपूर्ण सृष्टि समाहित है; इसमें अनगिनत मुख, भुजाएँ और सभी देवी-देवता, जीव-जंतु, ग्रह-नक्षत्र एक साथ दिखाई देते हैं, जैसा कि भगवद्गीता के 11वें अध्याय में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दिखाया था, जो उनकी असीमित शक्ति, सर्वव्यापकता और सृष्टि के रचयिता, पालक और संहारक होने का प्रतीक है।
विराट स्वरूप की विशेषताएँ:
अनंतता: इस रूप में भगवान विष्णु के अनगिनत मुख, आँखें और भुजाएँ होती हैं, जिनमें पूरा ब्रह्मांड समाया होता है।
ब्रह्मांडीय घटनाएँ: इसके भीतर जन्म, मृत्यु, सृजन और विनाश जैसी सभी ब्रह्मांडीय घटनाएँ घटित होती दिखती हैं।
तेजोमय: यह स्वरूप इतना तेजस्वी होता है, जैसे हजारों सूर्य एक साथ उग आए हों।
सभी रूपों का समावेश: इसमें सभी प्रकार के शस्त्र, दिव्य प्राणी, मनुष्य, जीव-जंतु और प्राकृतिक तत्व समाहित होते हैं।
सर्वव्यापकता: यह स्वरूप दर्शाता है कि भगवान ही सब कुछ हैं और सब कुछ उन्हीं का अंश है।
विराट स्वरूप के दर्शन के प्रसंग:
भगवद्गीता: भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान अर्जुन को यह स्वरूप दिखाया, जिससे अर्जुन को अपनी ड्यूटी (धर्म) का एहसास हुआ।
राजा बलि: वामन अवतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि को अपना विराट रूप दिखाया था।
मैया यशोदा: बाल-कृष्ण के रूप में उन्होंने अपनी माँ यशोदा को मिट्टी खाते समय यही विराट स्वरूप दिखाया था।
नारद मुनि: नारद मुनि को भी भगवान ने अपने विराट रूप के दर्शन कराए थे।
महत्व:
विराट स्वरूप भगवान की महानता, सर्वशक्तिमानता और सर्वोच्चता को दर्शाता है।
यह भक्तों को भौतिक जगत से परे परम सत्य का बोध कराता है और उन्हें भक्ति व श्रद्धा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। यह रूप देखकर मनुष्य को अपनी लघुता और ईश्वर की विशालता का अनुभव होता है।


