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।। ॐ ।। आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः।। हे अर्जुन! जो योगी अपने ही समान सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है, अपने-जैसा देखता है, सुख और दुःख भी सबमें समान देखता है, वह योगी (जिसका भेदभाव समाप्त हो गया है) परमश्रेष्ठ माना गया है। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - 3ঁ || || आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योडर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः। ।  हे अर्जुन! जो योगी अपने ही समान सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है, अपने ्जैसा देखता  { दुःख भी सबमें समान देखता 8, 3R है, वह योगी ( जिसका भेदभाव समाप्त हो गया है ) परमश्रेष्ठ माना गया है। 3ঁ || || आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योडर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः। ।  हे अर्जुन! जो योगी अपने ही समान सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है, अपने ्जैसा देखता  { दुःख भी सबमें समान देखता 8, 3R है, वह योगी ( जिसका भेदभाव समाप्त हो गया है ) परमश्रेष्ठ माना गया है। - ShareChat