गरूड़ पुराण अध्याय १६ का शेष भाग
वह धीर पुरुष घर से निकलकर पवित्र तीर्थ के जल में स्नान करके पवित्र और एकान्त देश में विधिवत आसन लगाकर बैठ जाए और शुद्ध परम त्रिवृत ब्रह्माक्षर अर्थात ओंकार का मन से अभ्यास करे तथा ब्रह्मबीज स्वरुप ओंकार का निरन्तर स्मरण करके श्वास को जीतकर मन को नियंत्रित करे। बुद्धि रूपी सारथी की सहायता से मन रूपी लगाम के द्वारा इन्द्रियों को विषयों से निगृहीत कर ले और कर्मों के द्वारा आक्षिप्त मन को बुद्धि की सहायता से शुभ अर्थ में अर्थात परब्रह्म के चिन्तन में लगा दे। मैं ब्रह्म हूँ, मैं परम धाम हूँ और परम पदरूपी ब्रह्म मैं हूँ – ऎसी समीक्षा करके अपनी आत्मा को निष्कल परमात्मा में लगा दे और ‘ओम्’ इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ तथा मेरा स्मरण करता हुआ जो मनुष्य देह-त्याग करता है, वह इस संसार से तर जाता है और परम गति प्राप्त करता है।
मान और मोह से रहित तथा आसक्ति से उत्पन्न होने वाले दोषों को जीत लेने वाले, सुख-दु:खादि द्वंद्वों से मुक्त ज्ञानी पुरुष उस शाश्वत अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं। जो व्यक्ति राग और द्वेष रूपी मलों का अपहरण करने वाले ज्ञानरूप जलाशय और सत्यस्वरुप जलवाले मानसतीर्थ में स्नान करता है, वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जो प्रौढ़ वैराग्य को धारण करके अन्य भावों का परित्याग कर केवल मद्विषयक भावना के द्वारा मेरा भजन करता है, ऎसा पूर्ण दृष्टि रखने वाला अमलान्तरात्मा संत ही मोक्ष को प्राप्त होता है।
“तीर्थ में मृत्यु हो जाय” – इस उत्कण्ठा से उत्सुक होकर जो अपने घर का परित्याग करके तीर्थ में निवास करता है और मुक्तिक्षेत्र में मरता है, वही मोक्ष प्राप्त करता है। अयोध्या, मथुरा, कनखल-हरिद्वार, काशी, कांची, अवन्तिका और द्वारावतीपुरी – ये सात पुरियाँ मोक्ष देने वाली हैं।
हे तार्क्ष्य ! मैंने सनातन मोक्ष धर्म को तुम्हें बता दिया, ज्ञान और वैराग्य के सहित इसे सुनकर पुरुष मोक्ष प्राप्त करता है। तत्त्वज्ञ पुरुष मोक्ष प्राप्त करते हैं, धार्मिक पुरुष स्वर्ग को प्राप्त होते हैं। पापियों की दुर्गति होती है और पशु-पक्षी आदि पुन:-पुन: जन्म-मरण रूपी संसार में भ्रमण करते हैं। इस प्रकार सभी शास्त्रों का सारोद्धार मैंने सोलह अध्यायों में कह दिया, अब और क्या सुनना चाहते हो? सूत उवाच सूत जी ने कहा – हे राजन ! गरुड़ जी ने भगवान के मुख से ऎसा वचन सुनकर उन्हें बार-बार प्रणाम करके अंजलि बाँधकर इस प्रकार कहा – गरुड़ जी ने कहा – हे देवाधिदेव भगवन ! हे नाथ ! हे प्रभो ! अपने अमृतमय वचनों को सुनाकर आपने मुझे भवसागर से तार दिया है। अब मेरा संदेह समाप्त हो गया और मैं कृतार्थ हो गया हूँ, इसमें संशय नहीं – ऎसा कहकर गरुड़ जी ने मौन होकर भगवद्ध्यानपरायण हो गए। स्मरण करने से जो दुर्गति का हरण कर लेते हैं, पूजन और यज्ञ के द्वारा जो सद्गति प्रदान करते हैं और अपनी परम भक्ति के द्वारा जो मुक्ति प्रदान करते हैं, वे हति मेरी रक्षा करें।
।।इस प्रकार गरुड़पुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में भगवान विष्णु ओर गरुड़ के संवाद में “मोक्षधर्मनिरूपण” नामक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ।।
गरुड़ पुराण-श्रवण (सुनने का) का फल
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श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान ने कहा – हे तार्क्ष्य ! इस प्रकार मैंने और्ध्वदैहिक कृत्यों के विषय में सब कुछ कह दिया। मरणाशौच में दस दिन के अंदर इसे सुनकर व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो जाता है। यह परलोक संबंदधी कर्म पितरों को मुक्ति प्रदान करने वाला है और परलोक में तथा इस लोक में भी पुत्र को वांछित फल देकर सुख प्रदान करने वाला है। जो नास्तिक अधम व्यक्ति प्रेत का यह और्ध्वदैहिक कर्म नहीं करते, उनका जल सुरा के समान अपेय है, इसमें कोई संशय नहीं। देवता और पितृगण उसके घर की ओर नहीं देखते अर्थात दोनों की ही कृपादृष्टि उन पर नहीं होती और उनके पितरों के कोप से पुत्र-पुत्रादि की भी दुर्गति होती है। प्रेतक्रिया के बिना ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और इतरजनों को भी चाण्डाल के समान जानना चाहिए। जो इस पुण्यप्रद प्रेतकल्प को सुनता और सुनाता है – वे दोनों ही पाप से मुक्त होकर दुर्गति को नहीं प्राप्त होते हैं। माता और पिता के मरण में जो पुत्र गरुण पुराण सुनता है, उसके माता-पिता की मुक्ति होती है और पुत्र को संतति की प्राप्ति होती है। जिस पुत्र ने माता-पिता की मृत्यु होने के अनन्तर गरुड़ पुराण का श्रवण नहीं किया, गया श्राद्ध नहीं किया, वृषोत्सर्ग नहीं किया, मासिक तथा वार्षिक श्राद्ध नहीं किया, वह कैसे पुत्र कहा जा सकता है और ऋणत्रय से उसे कैसे मुक्ति प्राप्त हो सकती है और वह पुत्र माता-पिता को तारने में कैसे समर्थ हो सकता है? इसलिए सभी प्रकार के प्रयत्नों को करके धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष रूप पुरुषार्थचतुष्टय को देने वाले तथा सर्वविध दु:ख का विनाश करने वाले गरुड़ पुराण को अवश्य सुनना चाहिए।
यह गरुड़ पुराण पुण्यप्रद, पवित्र तथा पापनाशक है, सुनने वालों की कामनाओं को पूर्ण करने वाला है, अत: सदा ही इसे सुनना चाहिए।
इस पुराण को सुनकर ब्राह्मण विद्या प्राप्त करता है, क्षत्रिय पृथिवी प्राप्त करता है, वैश्य धनाढ्य होता है और शूद्र पातकों से शुद्ध हो जाता है।
इस गरुड़पुराण को सुनकर सुनाने वाले आचार्य को पूर्वोक्त शय्याददानादि संपूर्ण दान देने चाहिए अन्यथा इसका श्रवण फलदायक नहीं होता।
पहले पुराण की पूजा करनी चाहिए तदनन्तर वस्त्र, अलंकार, गोदान और दक्षिणा आदि देकर आदरपूर्वक वाचक की पूजा करनी चाहिए।
प्रचुर पुण्यफल की प्राप्ति के लिए प्रभूत अन्न, स्वर्ण और भूमि दान के द्वारा श्रद्धा भक्तिपूर्वक वाचक की पूजा करनी चाहिए। वाचक की पूजा से ही मेरी पूजा हो जाती है, इसमें संशय नहीं और वाचक के संतुष्ट होने पर मैं भी संतुष्ट हो जाता हूँ, इसमें भी कोई संशय नहीं।
।।इस प्रकार गरुड़पुराण के श्रवण का फल संपूर्ण हुआ।।
।।इस प्रकार गरुड़पुराण सारोद्धार संपूर्ण हुआ।।
साभार~ पं देव शर्मा💐
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