हज़ारों वर्ष बाद मीरा ने अधिकार जता कर .. कहा कि तुम हो, यहीं हो और मैं तुम्हारी हूँ..!
और सचमुच श्री कृष्ण जितने मीरा के हुए उतने किसी के नही हुए .. प्रेम में डूबे सामान्य लोग अपने प्रिय पर दावा करते हैं कि तुम मेरे हो .. मीरा ने इसके उलट जाकर कहा कि मैं तुम्हारी हूँ...
मीरा ने मांगा नहीं. दिया.! और फिर बिन मांगें सब कुछ पा लिया..! जिस कृष्ण को स्वयं राधारानी अपना पति नहीं कह सकीं .. उनको मीरा ने साधिकार अपना पति कहा, माना और सिद्ध किया कि सचमुच ' ही थे ..
मीरा को पढ़कर लगता है कि सचमुच प्रेम समर्पण की पराकाष्ठा का नाम है..! मनुष्य सामान्यतः किसी एक के भरोसे नही रह पाता उसके मन में भरोसे का द्वंद चलता ही रहता है ..
इसपर करूँ या उसपर .. पर किसी एक के भरोसे रहने का आंनद अद्वितीय होता है .. बस कृष्ण सा निभाने वाला मिलना चाहिए..! पत्नियो को छोड़ दें तो श्री कृष्ण के जीवन में दो स्त्रियाँ आयी .. जिन्होंने अपना सर्वस्व उनके भरोसे छोड़ दिया..
पहली द्रोपदी चीरहरण के .. समय वो सबको भूलकर उन्होंने केवल और केवल श्री कृष्ण पर भरोसा किया .. फिर श्री कृष्ण ने जो भयविधि निभाई.. वह इतिहास है..! और दूसरी हुई मीरा .. श्री कृष्ण के आगे सब को भूल गयी
किसी ने कहा घर छोड़ दो तो छोड़ दिया, किसी ने कहा विष पी लो तो पी लिया, न किसी से भय, न किसी से मोह, भरोसा केवल श्री कृष्ण पर फिर श्री कृष्ण कैसे न होते मीरा के .. सच पूछिए.! तो स्वयंबर में श्री कृष्ण मीरा ने ही जीता था..!
मीरा के विषपान की बड़ी चर्चा हुई.. शायद प्रेम करना विष पीने जैसा ही होता है .. कृष्ण जैसा कोई मिल गया तो उस विष को अमृत बना देता है .. और प्रेम की प्रतिष्ठा रह जाती है..! कुछ मूर्ख कवियों ने कहा कि प्रेम किया नहीं जाता.?
हो जाता है.! इस सृष्टि में यूँ ही नहीं कुछ होता और प्रेम तो सजीवों का सबसे पवित्र भाव है उसे बिना जाँचे- परखे किसी को कैसे दे देंगे आप प्रेम के लिए तो सुपात्र का ही चयन होना चाहिए मीरा ने सुपात्र का चयन किया तो अमर हुई ..
खैर ! श्रीकृष्ण अकेले थे जिन्होंने सिद्ध किया कि जिसका कोई नही उसका मैं.. जिसने जिस रूप में चाहा उसे उस रूप में मिले .. नन्द बाबा और यशोदा मैया ने पुत्र रूप में चाहा तो न होते हुए भी उनके पुत्र हो गए..
गोपियों ने वात्सल्य भाव से देखा तो उनकी गोद में खेले..! राधा ने प्रेम किया तो उन्हें प्रेमी के रूप में मिले, और क्या खूब मिले .. उद्धव और अर्जुन ने मित्र रूप में चाहा तो उन्हें उस रूप में मिले ..
सुदामा ने ईश्वर के रूप में पूजा की तो उनका घर भर दिया .. जामवंत को लड़ने की चाह थी तो उनकी वह इच्छा भी पूरी की.. ! रुक्मिणी, सत्यभामा को तो छोड़िए, नरकासुर की बंदिनी, सोलह हजार राजकुमारियों ने पति रूप में चाहा तो उन्हें उस रूप में भी मिले ..
किसी को निराश नही किया फिर मीरा को कैसे निराश करते..? मीरा ने कृष्ण से मांगा नही कि मेरे हो जाओ बल्कि मान लिया कि श्री कृष्ण ही मेरे है .. आगे सब श्री कृष्ण के ऊपर था..
जिस दिन उन्होंने पहली बार श्री कृष्ण का नाम लिया उस दिन से अंतिम दिन तक श्री कृष्ण उन्हीं के रहे, उनके साथ रहे..!
श्री कृष्ण की प्रेमिकाओं ने दिखाया कि प्रेम करते कैसे हैं .. तो श्री कृष्ण ने बताया कि निभाते कैसे हैं .. संबंधों को निभाने में श्री कृष्ण अद्भुत हैं..! अच्छा सुनो.! श्री कृष्ण इतने आसानी से भी नही मिल जाते .. उसके लिए मीरा होना पड़ता है.. विष पीना पड़ता है....
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा ना कोये..
मेरे कृष्ण .. 🌹🙏
जय श्री राधे राधे 🌹🙏 #मीराबाई


