#जय श्री कृष्ण
गोलोक और किम्वर्ष का रहस्य
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गोलोक
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कहा जाता है कि गोलोक हमारी धरती और अन्य लोकों से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से बहुत ही दूर है गोलोक के बारे में एक कथा है कि एक बार नारद को अपनी भक्ति पर अभिमान हो गया और वो विचरते विचरते गोलोक जा रहे थे, परन्तु कुछ समय बाद उन्हें अनुभव हुआ कि गोलोक का मार्ग अत्यधिक ज्यादा लंबा हो गया है वो चकित विचलित हो उठे, क्योंकि उन्हें इतना चलने के बाद भी गोलोक का ना ओर मिल रहा था ना छोर, उन्होंने अथक प्रयत्न किया किन्तु वहीं के वहीं पहुँच जाते थे जहां से चले थे परन्तु मंजिल का कोई अता-पता ही नहीं था ! वो निराश हो कर भगवान श्री कृष्ण और श्री हरी नारायण को भजने लगे तब भगवान प्रकट हुए, अब तक नारद को अनुभव हो चुका था कि उनके अभिमान का ही ये दंड है वो प्रभु से क्षमा मांगने लगे ! भगवान ने भी क्षमा कर दिया वो अपने भक्तों के अवगुण हर कर उसे निश्छल मन करने में कहाँ पीछे रहते ! गोलोक में आज भी भगवान श्री कृष्ण समस्त गोपिकाओं और राधा जी के साथ आज भी निवास करते हैं !
गोलोक वास्तव में 51वें डायमेंशन में है, पुराणों और वेदों के अनुसार, और आधुनिक साइंस के अनुसार भी सृष्टि में 31 डायमेंशन संभावित हैं, परन्तु वहां तक पहुंचना दुष्कर और असंभव कार्य है तो गोलोक तो 51वें डायमेंशन में है, जहां का पता तो स्वयं इंद्र और अन्य देवताओं को भी नहीं है ! बस भगवान की इच्छा से ही वहां पहुंचा जा सकता है !
किम्वर्ष
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राम का परम धाम किम्पुरुष वर्ष और भारतवर्ष का वर्णन
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किम्वर्ष कहाँ है यह वास्तव में अज्ञात है ये सृष्टि के सभी डायमेंशन से पार है इस राम-लोक का पता हनुमान जी, विभीषण और जामवंत जी के अतिरिक्त किसी को भी नहीं है, नारद भी अभी तक वहां नहीं पहुँच सके हैं मन से पूर्ण समर्पित राम भक्त ही वहां जाने का अधिकारी हो सकता है ! किम्वर्ष भी गोलोक जैसा है किन्तु इसका आकार और प्रकार अज्ञात है ! धरती पर अयोध्या नगरी, ओरछा नगरी और साकते धाम को ही राम धाम माना और जाना जाता है परन्तु सृष्टि के पार राम का मुख्य धाम किम्वर्ष है जहां हनुमान जी, विभीषण जी और जामवंत जी सतत उनकी सेवा में रहते हैं, हनुमान जी से भी पहले माता शबरी को इस लोक में निवास मिला था !
राम का परम धाम किम्पुरुष वर्ष और भारतवर्ष का वर्णन
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श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजन्! किम्पुरुषवर्ष में श्रीलक्ष्मण जी के बड़े भाई, आदिपुरुष सीताहृदयाभिराम भगवान् श्रीराम के चरणों की सन्निधि के रसिक परमभागवत श्रीहनुमान जी अन्य किन्नरों के सहित अविचल भक्तिभाव से उनकी उपासना करते हैं। वहाँ अन्य गन्धर्वों के सहित आर्ष्टिषेण उनके स्वामी भगवान् राम की परम कल्याणमयी गुणगाथा गाते रहते हैं। श्रीहनुमान जी उसे सुनते हैं और स्वयं भी इस मन्त्र का जप करते हुए इस प्रकार उनकी स्तुति करते हैं-
‘हम ॐकारस्वरूप पवित्र कीर्ति भगवान् श्रीराम को नमस्कार करते हैं। आपमें सत्पुरुषों के लक्षण, शील और आचरण विद्यमान हैं; आप बड़े ही संयतचित्त, लोकाराधन तत्पर, साधुता की परीक्षा के लिये कसौटी के समान और अत्यन्त ब्राह्मण भक्त हैं। ऐसे महापुरुष महाराज राम को हमारा पुनः-पुनः प्रणाम है’। ‘भगवन्! आप विशुद्ध बोधस्वरूप, अद्वितीय, अपने स्वरूप के प्रकाश से गुणों के कार्यरूप जाग्रदादि सम्पूर्ण अवस्थाओं का निरास करने वाले, सर्वान्तरात्मा, परमशान्त, शुद्ध बुद्धि से ग्रहण किये जाने योग्य, नाम-रूप से रहित और अहंकार शून्य हैं; मैं आपकी शरण में हूँ।
प्रभो! आपका मनुष्यावतार केवल राक्षसों के वध के लिये ही नहीं है, इसका मुख्य उद्देश्य तो मनुष्यों को शिक्षा देना है। अन्यथा, अपने स्वरूप में ही रमण करने वाले साक्षात् जगदात्मा जगदीश्वर को सीता जी के वियोग में इतना दुःख कैसे हो सकता था। आप धीर पुरुषों के आत्मा और प्रियतम भगवान् वासुदेव हैं; त्रिलोकी की किसी भी वस्तु में आपकी आसक्ति नहीं है। आप न तो सीता जी के लिये मोह को ही प्राप्त हो सकते हैं और न लक्ष्मण जी का त्याग ही कर सकते हैं।
आपके ये व्यापार केवल लोक शिक्षा के लिये ही हैं। लक्ष्मणाग्रज! उत्तम कुल में जन्म, सुन्दरता, वाकचातुरी, बुद्धि और श्रेष्ठ योनि-इनमें से कोई भी गुण आपकी प्रसन्नता का कारण नहीं हो सकता, यह बात दिखाने के लिये ही आपने इन सब गुणों से रहित हम वनवासी वानरों से मित्रता की है। देवता, असुर, वानर अथवा मनुष्य-कोई भी हो, उसे सब प्रकार से श्रीरामरूप आपका ही भजन करना चाहिये; क्योंकि आप नर रूप में साक्षात् श्रीहरि ही हैं और थोड़े किये को भी बहुत अधिक मानते हैं।
आप ऐसे आश्रितवत्सल हैं कि जब स्वयं दिव्यधाम को सिधारे थे, तब समस्त उत्तर कोसलवासियों को भी अपने साथ ही ले गये थे’। भारतवर्ष में भी भगवान् दयावश नर-नारायणरूप धारण करके संयमशील पुरुषों पर अनुग्रह करने के लिये अव्यक्त रूप से कल्प के अन्त तक तप करते रहते हैं। उनकी यह तपस्या ऐसी है कि जिससे धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, शान्ति और उपरति की उत्तरोत्तर वृद्धि होकर अन्त में आत्मस्वरूप की उपलब्धि हो सकती है। हाँ भगवान् नारद जी स्वयं श्रीभगवान् के ही कहे हुए सांख्य और योगशास्त्र के सहित भगवन्महिमा को प्रकट करने वाले पांचरात्र दर्शन का सावर्णी मुनि को उपदेश करने के लिये भारतवर्ष की वर्णाश्रम-धर्मावलम्बिनी प्रजा के सहित अत्यन्त भक्तिभाव से भगवान् श्रीनर-नारायण की उपासना करते और इस मन्त्र का जप तथा स्तोत्र को गाकर उनकी स्तुति करते हैं।
( टिप्पणी 👉 यहाँ शंका होती है कि भगवान् तो सभी के आत्मा हैं, फिर यहाँ उन्हें आत्मवान् (धीर) पुरुषों के ही आत्मा क्यों बताया गया? इसका कारण यही है कि सबके आत्मा होते हुए भी उन्हें केवल आत्मज्ञानी पुरुष ही अपने आत्मारूप से अनुभव करते हैं-अन्य पुरुष नहीं। श्रुति में जहाँ-कहीं आत्मसाक्षात्कार की बात आयी है, वहीं आत्मवेत्ता के लिये ‘धीर’ शब्द का प्रयोग किया गया है। जैसे ‘कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षत’ इति ‘नः शुश्रुम धीराणाम्’ इत्यादि। इसीलिये यहाँ भी भगवान् को आत्मवान् या धीर पुरुष का आत्मा बताया है। ऊपर जायें एक बार भगवान् श्रीराम एकान्त में देवदूत से बात कर रहे थे। उस समय लक्ष्मण जी पहरे पर थे और भगवान् की आज्ञा थी कि कि यदि इस समय कोई भीतर आवेगा तो वह मेरे हाथ से मारा जायेगा। इतने में ही दुर्वासा मुनि चले आये और उन्होंने लक्ष्मण जी को अपने आने की सूचना देने के लिये भीतर जाने को विवश किया। इससे अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार भगवान् बड़े असमंजन में पड़ गये। तब वसिष्ठ जी ने कहा कि लक्ष्मण जी के प्राण न लेकर उन्हें त्याग देना चाहिये; क्योंकि अपने प्रियजन का त्याग मृत्युदण्ड के समान ही है। इसी से भगवान् ने उन्हें त्याग दिया। गोलोक धाम की तरह ही श्री राम का परम धाम वैकुण्ठ के साथ किम्पुरुष वर्ष भी है )
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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