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#महाभारत || उत्थान और पतनके कारण || जब धर्मराज युधिष्ठिर को ज्ञात हुआ कि भगवान् कृष्ण गोलोक चले गये तब उन्होंने अर्जुन से कहा कि 'अब हमें भी यहाँ से चल देना चाहिये।' सबने राजसी वस्त्र उतार कर वल्कल वसन पहन कर भारत की परिक्रमा प्रारम्भ की। युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी नीचे दृष्टि किये परिक्रमा करते हुए हरिद्वार पहुँचे तो चार सींग, सात हाथ और तीन पैर वाले एक देवता ने आकर रास्ता रोक दिया। जब उससे पूछा कि ऐसा क्यों ? तब उसने उत्तर दिया कि कर्ज मार कर जाने वाले को रास्ता नहीं मिलता। भाई ! क्या कर्जा है तेरा ? उसने कहा कि मेरा गाण्डीव मुझे दे दो। अन्ततोगत्वा पाँचों पाण्डव द्रौपदी-सहित स्वर्गारोहण के लिये हिमालय पर पहुँच गये। वहाँ उन्होंने चारों ओर बर्फ-ही- बर्फ देखी कि एक दम धड़ाम से किसी के गिरने की आवाज आयी। भीम बोले कि 'कौन गिरा ?' देखा तो द्रौपदी गिर पड़ी थी। युधिष्ठिर बोले 'गिरनेवाले को गिरने दो। पीछे मत देखो। किसी ओर से किसी की प्रतीक्षा मत करो। यदि इस धर्ममार्ग में कोई तुम्हारे साथ नहीं आना चाहता, तो कोई बात नहीं।' यह पूछने पर कि द्रौपदी क्यों गिरी ? उन्होंने बताया कि द्रौपदी के साथ पाँचों पाण्डवों का एक ही साथ पाणिग्रहण हुआ था और उसे कन्या होने की शक्ति प्राप्त थी। वह जब चाहे उन पाण्डव पतियों के लिये कन्या हो जाती थी। उसने पूर्वजन्म में बड़ी तपस्या की थी। भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये। उसने पाँच बार 'पतिं देहि' कहा-तो शिवजी ने उसे पाँच पतियों की प्राप्ति का वरदान दे दिया। द्रौपदी मूर्च्छा खाकर गिर पड़ी। फिर शंकरजी बोले अच्छा, मैं तुझे ऐसी शक्ति देता हूँ कि तू जब चाहे कन्या बन सकती है। एक बार युधिष्ठिर उसके पास थे— तो भीम ने देखा कि वे द्रौपदी के पैर दबा रहे थे। भीम ने कहा अरे ! यह धर्मराजजी तो नपुंसक हैं, स्त्री के पैर दबा रहे थे। उसने भगवान् कृष्ण को बताया तो वे बोले—अरे ! तू भी तो ऐसा ही करता है। भीम बोले—नहीं महाराज, तब श्रीकृष्णजी उन्हें रात्रि में घोर जंगल में ले गये और उनको एक पीपल के पेड़ पर बैठा कर बोले— भीम ! यहाँ से सब देखते रहना, डरना नहीं। वहाँ श्मशान में रात्रि में बड़ी विशाल सभा लगी, सब देवता आये। सब अपने-अपने सिंहासन पर बैठ गये। केवल एक सिंहासन खाली था। भीम ने देखा कि द्रौपदी सभा में आयी तो सब खड़े हो गये और प्रार्थना करने लगे द्रौपदी की। महाभारत का युद्ध चल रहा था, उसने बताया कि इस युद्ध में कोई जीवित नहीं बचेगा। भीम की घिग्घी बँध गयी, बोले मेरा तो हृदय बैठा जा रहा है। नीचे आकर बोले— मैं तो ऐसा नहीं समझता था। श्रीकृष्ण ने कहा कि चिन्ता न करो, मैं युद्ध में बचने का उपाय बताऊँगा। उन्होंने कहा कि इससे वरदान माँग लो कि हम पाँचों भाई युद्ध में जीवित बच जायँ—ऐसा ही हुआ। भगवान् कृष्णजी ने भी अपने लिये ऐसा ही वरदान माँगा। कहने का तात्पर्य यह है कि द्रौपदी कोई साधारण स्त्री नहीं थी, वह तो महाकाली—कालिका शक्ति थी, जो सारे महाभारत के युद्ध में खप्पर लिये घूमती रहती थी। परंतु फिर वह स्वर्ग जाते समय बीच में ही क्यों गिर पड़ी ? बताया कि वह अपने पाँचों पतियों में समान भाव से अनुरक्त न होकर अर्जुन से अधिक अनुरक्त थी, इसी पाप के कारण उसका पतन हुआ। अब दूसरी बार गिरने की आवाज हुई तो इस बार सहदेव थे। यह क्यों गिरे ? उसे अपनी बुद्धि का बड़ा अभिमान था। वह अपने से ज्यादा किसी को भी बुद्धिमान् नहीं समझता था— इसी के कारण वह गिरा। युधिष्ठिर सब पर बराबर निगाह रख कर सबकी कमी को जानते थे। इसके बाद नकुल धड़ाम-शब्द के साथ गिर पड़े। यह क्यों गिरे ? इन्हें अपने रूप का बड़ा घमण्ड था। वह कहते थे कि मुझे विधाता ने ऐसा रूप दिया है कि मुझे इसमें कोई नहीं हरा सकता। इसी घमण्ड के कारण वह गिरे। इसके बाद अर्जुन गिर पड़ा—पूछा, 'वह क्यों गिरा ?' बताया कि वह कहा करता था कि वह अकेला सारे संसार को एक दिन में जीत सकता है। परंतु महाभारत के युद्ध को जीतने में उसने अठारह दिन लगा दिये। उस सत्यवादी अर्जुन ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी न कर मिथ्या-भाषण एवं दर्पोक्ति की और गाण्डीव का भी अपमान हुआ। जब भीम गिर पड़े, तो बताया कि वह खाता बहुत था, कभी व्रत-उपवास नहीं रखता था। देवता एक बार भोजन करते हैं, मनुष्य दो बार, दैत्य तीन बार जबकि चार या इससे भी अधिक बार तो कुत्ता खाता है। भीम बड़ा पेटू था, भोजनभट्ट था और उसे अपने बल का, शक्ति का बड़ा घमण्ड था, अतः वह भी स्वर्गारोहण नहीं कर सका, बीच रास्ते में ही गिर गया। अब अंत में धर्मराज और कुत्ता बाकी रह गये। सब साथ छोड़ गये। इसी प्रकार अंतकाल में सब साथ छोड़ जायँगे, केवल धर्म ही साथ जायगा। चारों ओर बर्फ- ही- बर्फ थी, हिमालय के सर्वोच्च शिखर पर भारत सम्राट् धर्मराज युधिष्ठिर खड़े थे अपने कुत्ते के साथ कि उन्हें लेने स्वर्ग का विमान आया, कहा चलिये महाराज ! स्वर्ग चलिये ! धर्मराजने कहा कि पहले इस कुत्ते को विमान पर चढ़ाओ। देवताने उत्तर दिया कि यह नहीं जा सकता, आप विराजें विमान पर। तो धर्मराज ने उस कुत्ते के बिना स्वर्ग जाने से स्पष्ट मना कर दिया। जिसने अंत तक उनका मार्ग में साथ दिया, जबकि उनके भाई एवं पत्नी-तक साथ छोड़ गये। यदि धर्म में कुत्ता भी साथ दे, तो उसका भी परित्याग नहीं करना चाहिये। धर्मराज के मना करने पर तथा उनके द्वारा अपने पुण्यफल का आधा भाग प्रदान करते ही वह कुत्ता झट यमराज बन गया, और धर्मराज स्वर्गलोक को गये। इस प्रकार यह दृष्टान्त हमें यह बोध कराता है कि भेदभाव, मिथ्या-भाषण और अहंकार से पतन होता है, जबकि धर्म मार्ग पर दृढ़ रहने से उत्थान होता है। 🌿 🍂☘️🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿 ❀༺꧁||🙏जय माँ🙏||꧂༻❀ #दुर्गा_मन्दिर_शक्ति_पीठ_वाटिका
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