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पूर्णिमा #पूजन विधि
पूजन विधि - पूर्णिमा व्रत का उद्यापन भविष्यपुराण में प्राप्त वर्णन के अनुसार विशेषतः ज्येष्ठ पूर्णिमा अथवा किसी भी अन्य पवित्र माह की पूर्णिमा पर व्रत का उद्यापन करना चाहिये। उद्यापन सरल विधि निम्नलिखित है। सर्वप्रथम भूमि को लीपकर चौक पूरें। उसके मध्य में मिट्टी का कलश स्थापित कर उसके ऊपर बाँस का पात्र रखकर उसे ढँक दें। यथाशक्ति एक या आधे पल स्वर्ण की श्री उमा महेश्वर की मूर्ति निर्मित करवायें। वृषभ सहित उस मूर्ति को पात्र पर स्थापित कर दें। तदुपरान्त भगवान शिव का षोडशोपचार पूजन करें। कर्म से निवृत्त रात्रिकाल में भजन, कीर्तन एवं जागरण करें। प्रातःकाल स्नानादि होकर शिव पञ्चाक्षर मन्त्र से हवन करें। तिल, यव, घी के शाकल्य 108 आहुति प्रदान करें। हवन सम्पन्न होने पर आचार्यों का पूजन करें। बत्तीस प्रकार के फलों को वस्त्र में लपेटकर दीपक को धान के ऊपर रखकर "वाणकं तव ददामी गिरिजापते। " का उच्चारण करते हुये आचार्य को प्रदान करें। तुष्टयर्थं  तदुपरान्त बत्तीस ब्राह्मण बत्तीस स्त्रियों सहित अन्य आचार्यों को छहों रसों से युक्त भोजन अर्पित करें । धर्मग्रन्थों में इस अवसर पर आचार्य को बछड़े सहित सामर्थ्य न होने की स्थिति में यथाशक्ति f गाय दान करने का विधान है, दान ्दक्षिणा देकर आचार्य का आशीर्वाद ग्रहण करें। तत्पश्चात् पूर्णाहुति कर के भोजनोपरान्त शेष सामग्री का स्वयं भोजन हवन का समापन करें। সাম্মণী  भविष्यपुराण में वर्णित पूर्णिमा व्रत की उद्यापन विधि का करें। इस प्रकार सङ्क्षिप्त वर्णन समाप्त होता है। पूर्णिमा व्रत का उद्यापन भविष्यपुराण में प्राप्त वर्णन के अनुसार विशेषतः ज्येष्ठ पूर्णिमा अथवा किसी भी अन्य पवित्र माह की पूर्णिमा पर व्रत का उद्यापन करना चाहिये। उद्यापन सरल विधि निम्नलिखित है। सर्वप्रथम भूमि को लीपकर चौक पूरें। उसके मध्य में मिट्टी का कलश स्थापित कर उसके ऊपर बाँस का पात्र रखकर उसे ढँक दें। यथाशक्ति एक या आधे पल स्वर्ण की श्री उमा महेश्वर की मूर्ति निर्मित करवायें। वृषभ सहित उस मूर्ति को पात्र पर स्थापित कर दें। तदुपरान्त भगवान शिव का षोडशोपचार पूजन करें। कर्म से निवृत्त रात्रिकाल में भजन, कीर्तन एवं जागरण करें। प्रातःकाल स्नानादि होकर शिव पञ्चाक्षर मन्त्र से हवन करें। तिल, यव, घी के शाकल्य 108 आहुति प्रदान करें। हवन सम्पन्न होने पर आचार्यों का पूजन करें। बत्तीस प्रकार के फलों को वस्त्र में लपेटकर दीपक को धान के ऊपर रखकर "वाणकं तव ददामी गिरिजापते। " का उच्चारण करते हुये आचार्य को प्रदान करें। तुष्टयर्थं  तदुपरान्त बत्तीस ब्राह्मण बत्तीस स्त्रियों सहित अन्य आचार्यों को छहों रसों से युक्त भोजन अर्पित करें । धर्मग्रन्थों में इस अवसर पर आचार्य को बछड़े सहित सामर्थ्य न होने की स्थिति में यथाशक्ति f गाय दान करने का विधान है, दान ्दक्षिणा देकर आचार्य का आशीर्वाद ग्रहण करें। तत्पश्चात् पूर्णाहुति कर के भोजनोपरान्त शेष सामग्री का स्वयं भोजन हवन का समापन करें। সাম্মণী  भविष्यपुराण में वर्णित पूर्णिमा व्रत की उद्यापन विधि का करें। इस प्रकार सङ्क्षिप्त वर्णन समाप्त होता है। - ShareChat