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#मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 ##भगवद गीता🙏🕉️
मेरे विचार - या मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति | तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति I। जो पुरुप सम्पूर्ण  3 सवके आत्मरूप भूतोंमें वासुदेवको ही व्यापक देखता है और भूतोंको मुझ अन्तर्गत देखता है, वासुदेवके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहों ক্ানা Il 3০ Il सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः | सर्वथा वर्तमानोउपि स योगी मयि वर्तते ।। भूतोंमें जो पुरुप एकोीभावमें स्थित होकर सम्पूर्ण आत्मरूपसे स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेवको " भजता है, वह योगी सव प्रकारसे वरतता हुआ भी हा वरतता है।l ३१ ।। मुझमें गौता अध्याय ९ श्लोक ६में देखना चाहिये। आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योउ्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः I। हे अर्जुन ! जो योगी अपनो भाँति * सम्पूर्ण  भूतोंमें सम देखता है और सुख अथवा दुःखको भी सवमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है Il ३२ II श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 6 गोरखपूर प्रेस , से सामार गीता या मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति | तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति I। जो पुरुप सम्पूर्ण  3 सवके आत्मरूप भूतोंमें वासुदेवको ही व्यापक देखता है और भूतोंको मुझ अन्तर्गत देखता है, वासुदेवके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहों ক্ানা Il 3০ Il सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः | सर्वथा वर्तमानोउपि स योगी मयि वर्तते ।। भूतोंमें जो पुरुप एकोीभावमें स्थित होकर सम्पूर्ण आत्मरूपसे स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेवको " भजता है, वह योगी सव प्रकारसे वरतता हुआ भी हा वरतता है।l ३१ ।। मुझमें गौता अध्याय ९ श्लोक ६में देखना चाहिये। आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योउ्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः I। हे अर्जुन ! जो योगी अपनो भाँति * सम्पूर्ण  भूतोंमें सम देखता है और सुख अथवा दुःखको भी सवमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है Il ३२ II श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 6 गोरखपूर प्रेस , से सामार गीता - ShareChat