ShareChat
click to see wallet page
search
।। ॐ ।। असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः। वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः।। अर्जुन! मन को वश में न करनेवाले पुरुष के लिये योग प्राप्त होना कठिन है; किन्तु स्ववश मनवाले प्रयत्नशील पुरुष के लिये योग सहज है, ऐसा मेरा अपना मत है। जितना कठिन तू मान बैठा है, उतना कठिन नहीं है। अतः इसे कठिन मानकर छोड़ मत दो। प्रयत्नपूर्वक लगकर योग को प्राप्त कर; क्योंकि मन वश में करने पर ही योग सम्भव है। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - I Il असंयतात्मना योगो दुष्पाप इति मे मतिः।  वश्यात्मना तःयतना शक्योउ्वाप्तमुपायतःा | अर्जुन! मन को वश ्मे न करनेवाले पुरुप किन्तु के लिये योग प्राप्त होना कठिन हेः स्ववश मनवाले प्रयत्नशील पुरुप के लिये योग सहज हे॰ ऐसा मेरा अपना मत हे। जितना कठिन तू मान बेठा हे॰ उतना कठिन नर्ही हे। अतः इसे कठिन मानकर प्रयत्नपूर्वक लगकर योग को  छोड मत  दो। क्योकि मन वश र्मे करने परही प्राप्त कर योग सम्भव हे। I Il असंयतात्मना योगो दुष्पाप इति मे मतिः।  वश्यात्मना तःयतना शक्योउ्वाप्तमुपायतःा | अर्जुन! मन को वश ्मे न करनेवाले पुरुप किन्तु के लिये योग प्राप्त होना कठिन हेः स्ववश मनवाले प्रयत्नशील पुरुप के लिये योग सहज हे॰ ऐसा मेरा अपना मत हे। जितना कठिन तू मान बेठा हे॰ उतना कठिन नर्ही हे। अतः इसे कठिन मानकर प्रयत्नपूर्वक लगकर योग को  छोड मत  दो। क्योकि मन वश र्मे करने परही प्राप्त कर योग सम्भव हे। - ShareChat