🌹भक्ति भाव🌹
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*जब कैलाशपति बने भिखारी — भक्तिभाव की अद्भुत परीक्षा*
गोकुल में उस दिन एक अद्भुत लीला रची गई, जब कैलाशपति महादेव अपने आराध्य श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए स्वयं भिक्षुक का वेश धारण कर पृथ्वी पर उतर आए। जब उन्हें पता चला कि परमब्रह्म का अवतार नन्द बाबा के घर जन्मा है, तब कैलाश पर ठहर पाना उनके लिए असंभव हो गया—भक्ति की प्यास उन्हें गोकुल खींच लाई। उन्होंने सोचा, सीधे देव रूप में जाऊँगा तो सभी पहचान लेंगे, इसलिए जटाओं से युक्त, भस्म-धारी, बाघम्बर पहने, सर्पमालाओं से सुसज्जित वे एक जोगी के रूप में “अलख निरंजन” पुकारते यशोदा मैया के द्वार पहुँचे।
मैया ने दासी के हाथों भिक्षा भिजवाई, पर जोगी ने लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा— “माई, मुझे अन्न-धन नहीं चाहिए। मेरे गुरु ने कहा है कि यहाँ स्वयं परमात्मा बाल रूप में विराजते हैं। मुझे केवल उनके दर्शन की भीख चाहिए।” मैया बाहर आईं और साधु का भयानक स्वरूप देखकर घबरा गईं। वे हाथों को जोड़कर बोलीं— “महाराज, जो चाहे मांग लीजिए, पर अपने कोमल लल्ला को बाहर नहीं लाऊँगी। वह आपको देखकर डर जाएगा।”
तब उस जोगी ने, जो स्वयं महादेव थे, विनम्रता से प्रार्थना की—“मैया, मैं कुछ नहीं चाहता… बस एक झलक, एक पल… मेरे जीवन की सार्थकता हो जाएगी।”
भक्त की यह तड़प देखकर माता यशोदा का हृदय पिघल गया। वे नन्हे कान्हा को गोद में छिपाए बाहर आईं। और जैसे ही भोलेनाथ की दृष्टि अपने इष्ट—बालकृष्ण—पर पड़ी, वे आनंद से भर उठे। उनके नेत्रों में प्रेम के आँसू छलक उठे, वे सुध-बुध खोकर नाचने लगे। उस क्षण गोकुल में दिव्यता उतर आई—हरि-हर मिलन का ऐसा दृश्य स्वयं देवताओं के लिए भी दुर्लभ था।
कहानी का संदेश:,,
यह लीला हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति में न ऊँच-नीच है,न पद-प्रतिष्ठा।
महादेव जैसे देवाधिदेव भी अपने आराध्य के दर्शन हेतु विनम्र होकर भिक्षुक बन सकते हैं।भक्ति वही सच्ची है जिसमें नम्रता, प्रेम और पूर्ण समर्पण हो। और यह भी कि ईश्वर के दर्शन केवल शक्ति से नहीं, बल्कि भाव से मिलते हैं।
मंगलमय प्रभात
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