#श्रुमहाभारतकथा-3️⃣0️⃣6️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
नवनवतितमोऽध्यायः
महर्षि वसिष्ठ द्वारा वसुओं को शाप प्राप्त होने की कथा...(दिन 306)
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नानृतं तच्चिकीर्षामि क्रुद्धो युष्मान् यदन्नुवम् । न प्रजास्यति चाप्येष मानुषेषु महामनाः ।। ४० ।।
'मैंने क्रोधमें आकर तुमलोगोंसे जो कुछ कहा है, उसे असत्य करना नहीं चाहता। ये महामना द्यो मनुष्यलोकमें संतानकी उत्पत्ति नहीं करेंगे ।। ४० ।।
भविष्यति च धर्मात्मा सर्वशास्त्रविशारदः । पितुः प्रियहिते युक्तः स्त्रीभोगान् वर्जयिष्यति ।। ४१ ।।
'और धर्मात्मा तथा सब शास्त्रोंमें निपुण विद्वान् होंगे; पिताके प्रिय एवं हितमें तत्पर रहकर स्त्री-सम्बन्धी भोगोंका परित्याग कर देंगे' ।। ४१ ।।
एवमुक्त्वा वसून् सर्वान् स जगाम महानृषिः । ततो मामुपजग्मुस्ते समेता वसवस्तदा ।। ४२ ।।
उन सब वसुओंसे ऐसी बात कहकर वे महर्षि वहाँसे चल दिये। तब वे सब वसु एकत्र होकर मेरे पास आये ।। ४२ ।।
अयाचन्त च मां राजन् वरं तच्च मया कृतम् । जाताञ्जातान् प्रक्षिपास्मान् स्वयं गङ्गे त्वमम्भसि ।। ४३ ।।
राजन् ! उस समय उन्होंने मुझसे याचना की और मैंने उसे पूर्ण किया। उनकी याचना इस प्रकार थी 'गंगे ! हम ज्यों-ज्यों जन्म लें, तुम स्वयं हमें अपने जलमें डाल देना' ।। ४३ ।।
एवं तेषामहं सम्यक् शप्तानां राजसत्तम । मोक्षार्थं मानुषाल्लोकाद् यथावत् कृतवत्यहम् ।। ४४ ।।
राजशिरोमणे ! इस प्रकार उन शापग्रस्त वसुओंको इस मनुष्यलोकसे मुक्त करनेके लिये मैंने यथावत् प्रयत्न किया है ।। ४४ ।।
अयं शापादृषेस्तस्य एक एव नृपोत्तम ।
द्यौ राजन् मानुषे लोके चिरं वत्स्यति भारत ।। ४५ ।।
भारत ! नृपश्रेष्ठ ! यह एकमात्र द्यो ही महर्षिके शापसे दीर्घकालतक मनुष्यलोकमें निवास करेगा ।। ४५ ।।
(अयं देवव्रतश्चैव गङ्गादत्तश्च मे सुतः । द्विनामा शान्तनोः पुत्रः शान्तनोरधिको गुणैः ।। अयं कुमारः पुत्रस्ते विवृद्धः पुनरेष्यति । अहं च ते भविष्यामि आह्वानोपगता नृप ।।)
राजन् ! मेरा यह पुत्र देवव्रत और गंगादत्त-दो नामोंसे विख्यात होगा। आपका बालक गुणोंमें आपसे भी बढ़कर होगा। (अच्छा, अब जाती हूँ) आपका यह पुत्र अभी शिशु-अवस्थामें है। बड़ा होनेपर फिर आपके पास आ जायगा और आप जब मुझे बुलायेंगे तभी मैं आपके सामने उपस्थित हो जाऊँगी।
वैशम्पायन उवाच
एतदाख्याय सा देवी तत्रैवान्तरधीयत ।
आदाय च कुमारं तं जगामाथ यथेप्सितम् ।। ४६ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! ये सब बातें बताकर गंगादेवी उस नवजात शिशुको साथ ले वहीं अन्तर्धान हो गयीं और अपने अभीष्ट स्थानको चली गयीं ।। ४६ ।।
स तु देवव्रतो नाम गाङ्गेय इति चाभवत् ।
द्युनामा शान्तनोः पुत्रः शान्तनोरधिको गुणैः ।। ४७ ।।
उस बालकका नाम हुआ देवव्रत। कुछ लोग गांगेय भी कहते थे। द्यु नामवाले वसु शान्तनुके पुत्र होकर गुणोंमें उनसे भी बढ़ गये ।। ४७ ।।
शान्तनुश्चापि शोकार्तो जगाम स्वपुरं ततः।
तस्याहं कीर्तयिष्यामि शान्तनोरधिकान् गुणान् ।। ४८ ।।
इधर शान्तनु शोकसे आतुर हो पुनः अपने नगरको लौट गये। शान्तनुके उत्तम गुणोंका मैं आगे चलकर वर्णन करूँगा ।। ४८ ।।
महाभाग्यं च नृपतेर्भारतस्य महात्मनः । यस्येतिहासो द्युतिमान् महाभारतमुच्यते ।। ४९ ।।
उन भरतवंशी महात्मा नरेशके महान् सौभाग्यका भी मैं वर्णन करूँगा, जिनका उज्ज्वल इतिहास 'महाभारत' नामसे विख्यात है ।। ४९ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि आपवोपाख्याने नवनवतितमोऽध्यायः।। ९९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें आपवोपाख्यानविषयक निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९९ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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