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#इतिहास स्मृति #आज जिनकी पुण्यतिथि है
इतिहास स्मृति - आजाद भारत का पहला # ब्राह्मण नरसंहार १९४८ १९४८ में गांधी की हत्या के बाद महाराष्ट्र में जो हुआ, उसे आज भी इतिहास के पन्नों में दबा दिया गया हे। नाथूराम गोडसे के चितपावन ब्राह्मण होने का बदला लेने के नाम पर हजारों निर्दोष चितपावन ब्राह्मणों को निशाना बनाया गया। मूँणे गमुंबर्ई भाीगपुनर सतजरला कोल्हागपूरक औपर ग़्चामनीणश्षेत्रों घर जलाए॰ लोगों को पहचान कर संगठित भीड मारा, महिलाओं के साथ अत्याचार हुए ओर पूरा समाज  भय में डूब गया। यह हिंसा अचानक नहीं थी॰ बल्कि  योजनाबद्ध थी ओर इसमें कांग्रेस से जुड़े कार्यकर्ताओं की सक्रिय भूमिका बताई जाती हे।  वीर सावरकर के घर पर हमला हुआ, उनके भाई की हत्या कर दी गई। सेकड़ों नहीं, बल्कि हजारों ब्राह्मण  परिवार उजड़ गए, पलायन को मजबूर हुए ओर गरीबी मे चले गए की संख्या पर आज भी पर्दा पड़ा हे। कुछ পূনব্ধী इतिहासकार इसे सेकड़ों बताते हें॰ तो कई शोधों के अनुसार यह संख्या दो हजार से आठ हजार तक हो सकती हे। लेकिन पुलिस रिकॉर्ड सील हे॰ मीडिया  खामोश रहा ओर किसी को सजा नहीं मिली।  यह स्वतंत्र भारत के शुरुआती ओर सबसे भयानक सामुदायिक नरसंहारों में से एक था, जिसे अहिंसा की चादर में ढक दिया गया। १९४८ का यह सत्य आज भी न्याय ओर स्वीकार्यता की प्रतीक्षा कर रहा हे। इतिहास केवल वही नहीं होता जो पढ़ाया जाए, बल्कि वह भी होता हे जिसे जानबूझकर भुला दिया गया हो।  ৩fী ক্রুূত भारत में आज  ऐसी मानसिकता के लोग हे जो इतिहास को दोहराना चाहते हें !! 1948 चितपावन ब्राहण नरसंहार NCYw2o r   ३१ जनवरी से 3 फरवरी आजाद भारत का पहला # ब्राह्मण नरसंहार १९४८ १९४८ में गांधी की हत्या के बाद महाराष्ट्र में जो हुआ, उसे आज भी इतिहास के पन्नों में दबा दिया गया हे। नाथूराम गोडसे के चितपावन ब्राह्मण होने का बदला लेने के नाम पर हजारों निर्दोष चितपावन ब्राह्मणों को निशाना बनाया गया। मूँणे गमुंबर्ई भाीगपुनर सतजरला कोल्हागपूरक औपर ग़्चामनीणश्षेत्रों घर जलाए॰ लोगों को पहचान कर संगठित भीड मारा, महिलाओं के साथ अत्याचार हुए ओर पूरा समाज  भय में डूब गया। यह हिंसा अचानक नहीं थी॰ बल्कि  योजनाबद्ध थी ओर इसमें कांग्रेस से जुड़े कार्यकर्ताओं की सक्रिय भूमिका बताई जाती हे।  वीर सावरकर के घर पर हमला हुआ, उनके भाई की हत्या कर दी गई। सेकड़ों नहीं, बल्कि हजारों ब्राह्मण  परिवार उजड़ गए, पलायन को मजबूर हुए ओर गरीबी मे चले गए की संख्या पर आज भी पर्दा पड़ा हे। कुछ পূনব্ধী इतिहासकार इसे सेकड़ों बताते हें॰ तो कई शोधों के अनुसार यह संख्या दो हजार से आठ हजार तक हो सकती हे। लेकिन पुलिस रिकॉर्ड सील हे॰ मीडिया  खामोश रहा ओर किसी को सजा नहीं मिली।  यह स्वतंत्र भारत के शुरुआती ओर सबसे भयानक सामुदायिक नरसंहारों में से एक था, जिसे अहिंसा की चादर में ढक दिया गया। १९४८ का यह सत्य आज भी न्याय ओर स्वीकार्यता की प्रतीक्षा कर रहा हे। इतिहास केवल वही नहीं होता जो पढ़ाया जाए, बल्कि वह भी होता हे जिसे जानबूझकर भुला दिया गया हो।  ৩fী ক্রুূত भारत में आज  ऐसी मानसिकता के लोग हे जो इतिहास को दोहराना चाहते हें !! 1948 चितपावन ब्राहण नरसंहार NCYw2o r   ३१ जनवरी से 3 फरवरी - ShareChat