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#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana
satnam waheguru ji - सारेही देस को देखि रहिओ मत कोऊ न देखीअत प्रानपती பனfssசி के।।स्री भगवान की भाइकृषा ೯೩ ಖ[ हे भाई! मैने दुनिया के हर कोने , हर विचारधारा , हर तरह के वैभव और मीठा शक्ति का गहराई से अवलोकन कर लिया है लेकिन उस 'प्राणपति अकाल पुरख के सच्चे प्रेमियों और उसके मार्ग पर चलने वालों के बिना बाकी सब खाली दिखाई देता है। बिना उस अकाल पुरख की कृपा के, इंसान चाहे लगे कितना भी शक्तिशाली , धनवान या बड़ा क्यों न हो, वह एक कौड़ी या के बिना मनुष्य का और कृपा ` तिनके के समान भी नहीं है। परमात्मा के प्रेम  अस्तित्व और उसकी सारी उपलब्धियाँ शून्य हैं।जीवन में परमात्मा का प्रेम तेरा और उसकी कृपा नहीं है, तो उसकी सारी हस्ती, सारा अहंकार मिट्टी के है। गुरु साहिब यहाँ कर्मकांड, अहंकार और बाहरी दिखावे पर चोट समान करते हुए समझाते हैं किप्रेम ही सर्वोपरि है। अगर हृदय में प्रभु के लिए प्रेम WIUIT और सच्ची नीयत नहीं है, तो सब व्यर्थ है। परमात्मा पर रत्ती' भर कृपा ही इंसान को निहाल कर देती है। इंसान चाहे पूरी दुनिया का भ्रमण कर ले, पर शांति और मुक्ति ईश्वर की रज़ा और उसकी दया से ही मिलती है। मनुष्य दुनिया की दौड़ में खुद को कितना भी व्यस्त कर लें, लेकिन उसकी   अपनी आत्मा के मूल ( प्राणपति ) से जुड़ना ही जीवन का असली लक्ष्य होना चाहिए। सारेही देस को देखि रहिओ मत कोऊ न देखीअत प्रानपती பனfssசி के।।स्री भगवान की भाइकृषा ೯೩ ಖ[ हे भाई! मैने दुनिया के हर कोने , हर विचारधारा , हर तरह के वैभव और मीठा शक्ति का गहराई से अवलोकन कर लिया है लेकिन उस 'प्राणपति अकाल पुरख के सच्चे प्रेमियों और उसके मार्ग पर चलने वालों के बिना बाकी सब खाली दिखाई देता है। बिना उस अकाल पुरख की कृपा के, इंसान चाहे लगे कितना भी शक्तिशाली , धनवान या बड़ा क्यों न हो, वह एक कौड़ी या के बिना मनुष्य का और कृपा ` तिनके के समान भी नहीं है। परमात्मा के प्रेम  अस्तित्व और उसकी सारी उपलब्धियाँ शून्य हैं।जीवन में परमात्मा का प्रेम तेरा और उसकी कृपा नहीं है, तो उसकी सारी हस्ती, सारा अहंकार मिट्टी के है। गुरु साहिब यहाँ कर्मकांड, अहंकार और बाहरी दिखावे पर चोट समान करते हुए समझाते हैं किप्रेम ही सर्वोपरि है। अगर हृदय में प्रभु के लिए प्रेम WIUIT और सच्ची नीयत नहीं है, तो सब व्यर्थ है। परमात्मा पर रत्ती' भर कृपा ही इंसान को निहाल कर देती है। इंसान चाहे पूरी दुनिया का भ्रमण कर ले, पर शांति और मुक्ति ईश्वर की रज़ा और उसकी दया से ही मिलती है। मनुष्य दुनिया की दौड़ में खुद को कितना भी व्यस्त कर लें, लेकिन उसकी   अपनी आत्मा के मूल ( प्राणपति ) से जुड़ना ही जीवन का असली लक्ष्य होना चाहिए। - ShareChat