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#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana
satnam waheguru ji - मुदा रसंतोखु सरमु पतु झौली धिआन की करहि बिभूतिाखिंथा कालु कुआरी काइओ जुगति ्डंडा़ परतीतिा गुरु साहिब ने योगियों को बाहरी प्रतीकों के बजाय आंतरिक गुणों HoT में मिट्टी या कांच की मुँद्रा को अपनाने की सलाह दी। योगी कानों ' कुंडल ) पहनते थे। गुरु जी कहते हैं संतोष को अपने कानों की ೯ಷ बनाओ। यानी जो परमात्मा दे उसमें खुश रहना ही असली योग और पात्र रखते थे। गुरु जी कहते हैं शर्म योगी भिक्षा के लिए' झोली लगे (मेहनत और विनम्रता ) को अपना पात्र और झोली बनाओ। योगी विभूति) मलते थे। गुरु जी कहते हैं, प्रभु के ध्यान को शरीर पर राख फटे हुए ' ही अपने शरीर की भस्म बना लो। योगी कपड़ों की पुराने जी कहते हैं काल (मृत्यु) की याद को थे। गुरु  गोदड़ी (खिंथा ) पहनते तेरा अपनी गोदड़ी बनाओ। यानी हमेशा याद रखो कि जीवन नश्वर है, यही सबसे बड़ा त्याग है। अपनी काया (शरीर) को विकारों से बचाकर कुंवारा (निर्मल/ पवित्र) रखना ही योग की सच्ची जुगति (विधि) है। योगी हाथ में एक डंडा रखते थे। गुरु जी कहते हैंः प्रभु पर भाणा परतीति (अखंड विश्वास / श्रद्धा) को अपना डंडा बनाओ। उस समय आई पंथ योगियों का सबसे ऊँचा संप्रदाय माना जाता था। गुरु जी कहते हैं कि जो मनुष्य सगल जमाती पूरी मानवता को अपना साथी समझता है, वही वास्तव में सबसे ऊँचे आई पंथ का है। गुरु ' नानक देव जी स्पष्ट कर रहे हैं कि परमात्मा को पाने के' लिए जंगल जाने या शरीर पर राख मलने की आवश्यकता नहीं है। यदि आपके भीतर संतोष , विनम्रता , प्रभु स्मरण और सबको एक समान में रहकर भी  बड़े योगी देखने की दृष्टि है, तो आप घर गृहस्थी Hq4 81 मुदा रसंतोखु सरमु पतु झौली धिआन की करहि बिभूतिाखिंथा कालु कुआरी काइओ जुगति ्डंडा़ परतीतिा गुरु साहिब ने योगियों को बाहरी प्रतीकों के बजाय आंतरिक गुणों HoT में मिट्टी या कांच की मुँद्रा को अपनाने की सलाह दी। योगी कानों ' कुंडल ) पहनते थे। गुरु जी कहते हैं संतोष को अपने कानों की ೯ಷ बनाओ। यानी जो परमात्मा दे उसमें खुश रहना ही असली योग और पात्र रखते थे। गुरु जी कहते हैं शर्म योगी भिक्षा के लिए' झोली लगे (मेहनत और विनम्रता ) को अपना पात्र और झोली बनाओ। योगी विभूति) मलते थे। गुरु जी कहते हैं, प्रभु के ध्यान को शरीर पर राख फटे हुए ' ही अपने शरीर की भस्म बना लो। योगी कपड़ों की पुराने जी कहते हैं काल (मृत्यु) की याद को थे। गुरु  गोदड़ी (खिंथा ) पहनते तेरा अपनी गोदड़ी बनाओ। यानी हमेशा याद रखो कि जीवन नश्वर है, यही सबसे बड़ा त्याग है। अपनी काया (शरीर) को विकारों से बचाकर कुंवारा (निर्मल/ पवित्र) रखना ही योग की सच्ची जुगति (विधि) है। योगी हाथ में एक डंडा रखते थे। गुरु जी कहते हैंः प्रभु पर भाणा परतीति (अखंड विश्वास / श्रद्धा) को अपना डंडा बनाओ। उस समय आई पंथ योगियों का सबसे ऊँचा संप्रदाय माना जाता था। गुरु जी कहते हैं कि जो मनुष्य सगल जमाती पूरी मानवता को अपना साथी समझता है, वही वास्तव में सबसे ऊँचे आई पंथ का है। गुरु ' नानक देव जी स्पष्ट कर रहे हैं कि परमात्मा को पाने के' लिए जंगल जाने या शरीर पर राख मलने की आवश्यकता नहीं है। यदि आपके भीतर संतोष , विनम्रता , प्रभु स्मरण और सबको एक समान में रहकर भी  बड़े योगी देखने की दृष्टि है, तो आप घर गृहस्थी Hq4 81 - ShareChat