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🚩 वह अधूरापन, जो पूर्णता से भी सुंदर बन गया: श्री जगन्नाथ प्राकट्य कथा 🚩
ओडिशा के पुरी में उठती समुद्र की लहरों के शोर के बीच एक रहस्य सदियों से गूंज रहा है। यह कथा केवल एक मंदिर के निर्माण की नहीं, बल्कि एक वचन के टूटने और भगवान के एक अनोखे रूप के प्रकट होने की है।
अक्सर हम सुंदरता को 'पूर्णता' में खोजते हैं, लेकिन जगन्नाथ जी ने दुनिया को सिखाया कि प्रेम में अधूरापन भी संपूर्ण होता है।
द्वापर युग का अंत हो चुका था। भगवान श्रीकृष्ण अपनी लीला समाप्त कर स्वधाम गमन कर चुके थे। पांडवों ने उनका अंतिम संस्कार किया, शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया, लेकिन आग की लपटें भी उनके हृदय (पिंड) को जला न सकीं। वह धड़कता हुआ हृदय ही 'ब्रह्म पदार्थ' था।
लहरों के साथ बहता हुआ वह दिव्य अंश उड़ीसा के तट पर पहुंचा। वहां 'जरा' नामक बहेलिया (जिसके बाण से कृष्ण की लीला समाप्त हुई थी) ने उसे पाया। उसने उसे साधारण पत्थर नहीं, बल्कि साक्षात ईश्वर माना। पीढ़ियों तक घने जंगलों के बीच, भील सरदार विश्ववसु उस 'नीलमाधव' की गुप्त रूप से पूजा करते रहे।
मालवा नरेश इंद्रद्युम्न परम विष्णु भक्त थे। एक रात स्वप्न में प्रभु ने कहा:
"राजन! मैं नीलांचल (पुरी) की गुफाओं में 'नीलमाधव' के रूप में हूँ। मुझे वहां से मुक्त कर एक भव्य मंदिर में स्थापित करो।"
राजा ने विद्यापति नामक ब्राह्मण को खोज में भेजा। विद्यापति ने भील सरदार की पुत्री से विवाह कर, छल और प्रेम के मिश्रण से नीलमाधव का पता तो लगा लिया, लेकिन जब राजा वहां पहुंचे, तो नीलमाधव अंतर्ध्यान हो चुके थे। राजा के अहंकार और विद्यापति के छल से भगवान रूठ गए थे।
तभी आकाशवाणी हुई:
"राजन! मैं अब तुम्हें इस रूप में नहीं मिलूंगा। तुम समुद्र तट पर जाओ, वहां एक दारु (लकड़ी का कुंदा) तैरता हुआ आएगा। उसी काष्ठ से मेरा विग्रह बनेगा।"
अगले ही दिन पुरी के समुद्र तट पर एक विशाल, अपौरुषेय लकड़ी का कुंदा तैरता दिखा। उसमें शंख-चक्र-गदा-पद्म के चिह्न थे। राजा की सेना, बड़े-बड़े हाथी, सबने जोर लगा लिया, पर लकड़ी का वह टुकड़ा अपनी जगह से एक इंच न हिला।
राजा हताश हो गए। तब उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। यह शक्ति का प्रदर्शन नहीं, भक्ति की परीक्षा थी।
उन्होंने भील सरदार विश्ववसु (जिन्होंने पीढ़ियों तक प्रभु की सेवा की थी) से क्षमा मांगी और उन्हें सम्मानपूर्वक बुलाया।
दृश्य अद्भुत था—एक ओर राजा, दूसरी ओर ब्राह्मण विद्यापति और तीसरी ओर भक्त शबर विश्ववसु। जब इन तीनों ने मिलकर प्रेमपूर्वक उस दारु-ब्रह्म को स्पर्श किया, तो वह भारी लकड़ी फूल सी हल्की होकर उठ गई।
लकड़ी मंदिर आ गई, लेकिन कोई भी छेनी-हथौड़ी उस पर निशान तक नहीं बना पाई। औजार टूट जाते, पर लकड़ी वैसी ही रहती।
तभी एक दिन, ढलती शाम में एक बूढ़ा कारीगर राजदरबार में आया। कांपते हाथ, झुकी कमर, लेकिन आंखों में गजब का तेज।
उसने कहा: "राजन! मैं बनाऊँगा विग्रह। लेकिन मेरी एक शर्त है।"
राजा ने पूछा: "क्या शर्त है बाबा?"
वृद्ध ने कहा: "मैं 21 दिनों तक मंदिर के गर्भ गृह को अंदर से बंद करके काम करूँगा। इन 21 दिनों तक न कोई अंदर आएगा, न कोई झांकेगा और न ही द्वार खोलेगा। यदि यह वचन टूटा, तो मैं काम अधूरा छोड़कर चला जाऊंगा।"
राजा ने शर्त मान ली। द्वार बंद हो गए।
शुरुआत के दिनों में अंदर से छेनी-हथौड़ी की 'ठक-ठक' की आवाजें आती रहीं। पूरा नगर उस आवाज को सुनता। सबको तसल्ली थी कि काम चल रहा है।
लेकिन 15वें दिन अचानक... सब शांत हो गया।
अंदर से कोई आवाज नहीं आ रही थी।
रानी गुंडिचा का हृदय कांप उठा। उन्होंने राजा से कहा, "स्वामी! वह शिल्पी बहुत वृद्ध था। पिछले 15 दिनों से उसने न जल पिया है, न अन्न खाया है। अंदर से आवाज भी नहीं आ रही। कहीं... कहीं उनकी मृत्यु तो नहीं हो गई? हमें द्वार खोलकर देखना चाहिए!"
राजा इंद्रद्युम्न वचन से बंधे थे, पर रानी की चिंता और अनहोनी की आशंका उन पर हावी हो गई।
तर्क ने धैर्य को हरा दिया। राजा ने आदेश दिया, "द्वार खोलो!"
जैसे ही द्वार खुला, राजा और रानी सन्न रह गए।
अंदर वह बूढ़ा शिल्पी कहीं नहीं था। वह गायब हो चुका था (वे साक्षात विश्वकर्मा थे)।
सामने तीन मूर्तियां रखी थीं—
* जगन्नाथ (श्रीकृष्ण),
* बलभद्र (दाऊ),
* और बहन सुभद्रा।
लेकिन... यह क्या? मूर्तियां अधूरी थीं!
न उनके हाथ थे, न पैर। पंजे बने नहीं थे, कान नहीं थे। केवल बड़ी-बड़ी गोल आँखें और एक मुस्कान।
राजा इंद्रद्युम्न रो पड़े। "हाय! यह मैंने क्या अनर्थ कर दिया? मेरे उतावलेपन ने भगवान को अधूरा रख दिया।" वे आत्मग्लानि से भर गए।
उसी रात, राजा के स्वप्न में भगवान जगन्नाथ आए और उन्होंने जो कहा, वह आज भी भक्तों के लिए सबसे बड़ा संबल है।
प्रभु ने कहा:
"राजन! शोक मत करो। यह कोई संयोग नहीं, मेरी ही इच्छा है। मैं ऐसा ही रहना चाहता हूँ।"
"बिना पैरों के मैं अपने भक्तों की पुकार पर दौड़ा चला आऊंगा। बिना हाथों के मैं उनका दिया प्रसाद ग्रहण करूँगा। और इन बड़ी-बड़ी आँखों से मैं सृष्टि के कण-कण को देखूँगा।"
यह वही स्वरूप है, जो द्वापर में नारद जी ने देखा था। कहते हैं, एक बार द्वारका में माता रोहिणी, रानियों को ब्रज की लीला सुना रही थीं। वह प्रेम कथा इतनी रसपूर्ण थी कि छिपकर सुन रहे कृष्ण, बलराम और सुभद्रा के शरीर प्रेम-भाव में पिघलने लगे, उनके हाथ-पैर सिकुड़ गए और नेत्र विशाल हो गए।
भगवान ने उसी 'महाभाव' वाले स्वरूप को कलयुग के लिए चुना।
जगन्नाथ जी का वह रूप आज भी हमें बताता है कि ईश्वर को सोने-चांदी के आभूषणों या सुंदर काया की आवश्यकता नहीं है। वे तो 'भाव' के भूखे हैं। वह टूटा हुआ वचन, मानव इतिहास की सबसे सुंदर भूल बन गया, जिसने हमें 'जगन्नाथ' दिए।
आज भी वे वैसे ही हैं—
अधूरी काया, पर करुणा पूरी।
🙏🏻जय जगन्नाथ! ❤️🥀


