sn vyas
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏
🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏
#भाग_४४/२
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गतांक से आगे
नियत कर्म -- स्वकर्म -- स्वधर्म : अपने प्रत्येक कर्म को परमात्मा की पूजा की सामग्री बना लो :*
भगवान गीता में स्पष्ट रूप से कहते हैं कि ---
*यत् करोषि यद् अश्नासि, (गीता 9-27)*
*तू अपना जो भी नियत - कर्म करें वह मुझे अर्पण करने की दृष्टि से करना और फिर देखना कि वह कर्म तुझसे स्वत: शुद्ध ही होगा ।*
*भगवान कहते हैं कि-*
*स्वे स्वे कर्माणि अभिरत:, (गीता 18-45)*
*तू किसी के कर्म में हस्तक्षेप मत कर ,, तू अपना नियत कर्म ठीक से कर । संसार के नाटक में तू स्टेज पर है । यहां तू अपना पात्र ठीक से अदा कर। कोई अपना पात्र अदा करने में गलती करता है तो मैनेजर उसकी तनख्वाह काट लेगा या उसे निकाल देगा।*
*किंतु अन्य लोग अपना पात्र ठीक से निभाते हैं या नहीं , यह देखने का काम तेरा नहीं है । वह मैनेजर (परमात्मा ) का काम है , वही देखेगा । तू बेकार में दूसरे के झंझटो में मत पड। तू अपने पात्र का ध्यान रखकर , अपना पात्र अदा करेगा , तो अन्य पात्र अपना पात्र ठीक से अदा नहीं भी करेंगे तो मैनेजर (परमात्मा) तुझे नुकसान नहीं होने देगा , तुझे रोक-टोक भी नहीं करेगा ।*
*"पराई मूर्खता के लिए , तू अपने मुख में जहर पैदा मत होने देना "*
*तेरा पुत्र के रूप में , पिता के रूप में , पति के रूप में, सेठ के रूप में , या नौकर के रूप में , जो पात्र इस विश्व के स्टेज पर सुनिश्चित हुआ हो ,, उसे तुझे सुंदर ढंग से अदा करना है। जिससे मैनेजर (परमात्मा) खुश हो जाए । तू अन्य लोगों की चिंता नहीं करना और बेकार के झंझटो में नहीं पड़ना।*
*तू कोई भी कर्म कर । वह ऐसी भावना से कर कि इस कर्म में मैं भगवान का पूजन कर रहा हूं।*
क्रमश: ✍🏽
#कर्म #कर्म ही पूजा है #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta